Sunday, 27 January 2019

CLEAN YOUR MIND

                               
                                ज़हर 

                            नेहाकी शादी एक बड़े घर मे हुई थी। उसके घरमें तिनही लोग थे,वह, उसका पती और उसकी सास। उसके पतीका कारोबार था।घरमें सब सुख सुविधाएं थी। शुरूमे सबकुछ अच्छा चल रहा था लेकिन धीरे धीरे सास बहुमे अनबन होने लगी। नेहा एक नये जमानेकी लड़की थी, लेकिन सास थोड़ीसी पुराने ख़यालोंकी थीं।कई बातोंको लेकर उन दोनोंमें हमेशा तनाव रहता था। इस पूरे मामले में नहाके पती की बहुत बुरी हालत होती थीं। इन दोनोंके रोज़ रोज़ के झगड़े से बेचारा ऊब गया था। उसने धीरे धीरे घर की तरफ और नेहा की ओर भी ध्यान देना छोड़ दिया। घर मे हो रहे इन सभी बातोंको, नेहा उसकी सास को जिम्मेदार मानती थी। अब नेहा इतनी परेशान हो चुकी थीं कि उसने अपनी सास को जानसे मारनेका ईरादा किया।
              इसी इरादेसे वह एकदिन अपने डॉक्टर चाचा से मिलने गई। वे आयुर्वेदिक इलाज करनेमें माहिर थे।नेहा ने उनकों सबकुछ बताया और उनसे ज़हर की माँग की। नेहा की बातों से  चाचा सबकुछ समझ गए थे। उन्होंने नेहा को ज़हर के लिए हां कहा लेकिन उन्होंने नेहा को अपनी सासके साथ अच्छा बर्ताव करनेके लिए भी कहा,उसका हर कहाँ मानने को कहा ताकि किसीको शक ना हो। उसको तो कुछदिनोंके लिये ही अच्छा बर्ताव करना था, तो उसनेभी ख़ुशीसे चाचा की बात मान ली। चाचाने उसके हात में कुछ जड़ी बूटियाँ थमा दी और उनकों रोज़ थोड़ा थोड़ा खानेमें मिलानेको कहाँ।
            जैसे ही नेहा अपने घर आयी उसका नूर बदल गया था। अपनी सास के साथ वह अच्छा बर्ताव करने लगी, उसकी हर बात मानने लगी,उसे अच्छा खाना पकाकर खिलाने लगी,उसकी सेवा करने लगी।धीरे धीरे उसकी सास भी उसके साथ अच्छा बोलने लगी,उसका ख्याल रखने लगी। जैसे जैसे दिन बीतने लगें दोनोंमें प्यार बढ़ता गया।घरमें शांती का माहौल तैयार होने लगा।  अब तो उसकी सास हरएक के सामने अपनी बहुके गुणगान गाने लगी। और तो और दोनों में माँ बेटी जैसा रिश्ता तैयार होने लगा। सास बहू में और पूरे घरमें हुए बदलाव को देखकर नेहा का पती भी उनके साथ हसी ख़ुशीसे पेश आने लगा। सब अच्छा हो गया था लेकिन अब नेहा के मन मे खलबली होने लगी। वह आज तक सास के खानेमें  ज़हर मिलाते आयी थी। सासमे हुए बदलाव से और दोनों में बढ़ते लगाव के कारण नेहा को उसके किये का पछतावा हो रहा था। अब वह अपनी सास की लंबी उम्र चाहती थी। उसने अब तो खाने में ज़हर घोलना बंद किया था लेकिन उससे पहले तो उसने ढ़ेर सारा जहर मिलाया था।अब वह बेचैन होने लगीं। उसी बेचैनी के साथ वह फिर एक बार आपने डॉक्टर चाचा के पास गयी। उनकों सब बदलावोके बारेमें बताया और उस ज़हर का असर कम होने के लिए और सास की तबियत अच्छी होनेके लिये दवाई माँगने लगी। चाचा जोर जोर से हँसने लगें। नेहा तो हैरान हो गयी। उसने उनकों हँसने की वज़ह पूछी तो चाचा बोले," मैंने तुम्हें ज़हर दिया ही नहीं था। वे तो सेहत अच्छी करनेवाली दवाईया थीं। ज़हर तो तुम्हारे मन मे था। तुम्हारा गुस्सा,चिड़चिड़ापन, द्वेष, अहंकार यह सब ज़हर ही था,जो अब पूरी तरह से उतर गया है। अब तुम्हारा मन साफ़ हो गया है। अब तुम्हे किसीभी दवाई की जरूरत नहीं है।" यह सुनकर नेहा बहुत खुश हुई। आपने चाचा का आभार मानकर वह हँसते हुये, मन में ढ़ेर सारा प्यार भरकर आपने घर चली गयी।
             कई बार हम हमारे मन में अहंकार,द्वेष, गुस्सा आदि किन किन तरह के जहर को पैदा करते रहते है। उनकों बाहर निकाले बिना हम औरो के साथ अच्छा व्यवहार नही कर सकतें। दूसरों में बदलाव लाने के लिये हमें ख़ुदमे बदलाव करना चाहिए।

Let's clean our minds from the poisonous thoughts.

Mr. Abhijeet Manav.

Wednesday, 9 January 2019

Experience your life

                             अनुभूति

                         एक बार जब नेपोलियन रशिया पर चढ़ाई कर रहा था। उस वक्त ओ अनजाने से अपने सेना से अलग हो गया। इस दौरान रशियन सैनिक उसे अकेला पाकर उसका पिछा करने लगे। नेपोलियन अकेला होने की वजह से यहाँ वहाँ भागने लगा। भागते हुये वह एक समूर(जानवरों की चमड़ी)बेचनेवाले की दुकान में जा पहुंचा। उस दूकानदार ने उसे एक कोनेमें पड़े समूर के ढ़ेर में छिपाया। लेकिन सैनिकोंने नेपोलियन को उस दुकान में जाते हुए देखनेकी वज़ह से वे सारे सैनिक दुकान में घुस गये। उन्होंने सारी दुकान उथलपुथल कर दी। उन्होंने समूर के ढ़ेरको तक नही छोड़ा। वे अपनी तलवारें उसमे घुसेड़ने लगें। अपने भालोंसे कोचने लगे। इतना कुछ करनेके बावजूद वे लोग नेपोलियन को ढूढ़नेमे नाकामयाब रहे। जल्द ही वे वहाँसे चले गए।
        थोड़ी देर बाद नेपोलियन के सैनिक वहाँ पर आ पहुंचे। जैसे ही  ओ वहां आए, नेपोलियन ढ़ेर में से रेंगता हुवा बाहर आया। दुकानदार यह सब अपनी आँखे बाहर निकाल करही देख रहा था। उसे तो लगा था की, नेपोलियन शायद मरही गया होगा, लेकिन उसे जिंदा पाकर वह तो अचंबित ही रह गया। जैसी ही नेपोलियन बाहर आया, उस दुकानदार ने घबराते हुयेही नेपोलियन से पूछा," मैं आप जैसे महान राजा से माफी मांग कर एक सवाल पूछता हूं की, जब आप उस ढ़ेर के नीचे मौतके बिल्कुल करीब थे तब आपको क्या मेहसूस हो रहा था? आपके मनमें क्या विचार थे?आपको कैसा लग रहा था?"
     यह सब सुनतेही नेपोलियन उसके करीब गया और क्रोधीत होकर बोला,"  मुझसे, राजा नेपोलियन से ऐसा सवाल करनेकी तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?" उसने अपने सैनिकोकि तरफ देखा और बोला," ले आओ इस गुस्ताख़ को बाहर। इसकी आँखोपर पट्टी बाँधो। मैं खुद इसको आग में जलाने की सूचना दूंगा।"
          नेपोलियन के कहनेपर सैनिकोंने उसे दुकान के बाहर निकाला। उसके आँखोपर पट्टी बाँधी और उसे थोड़ी दूरीपर खड़ा किया। दुकानदारकी तो बोलतिही बंध हो चुकी थी। उसे पछतावा हो रहा था। वह दया की भीख मांग रहा था। पर कोई भी उसकी बातको मान नही रहा था। सैनिकोंने उसके ऊपर मिट्टीका तेल डाल दिया। दुकानदार बहुत घबरा गया था। आँखोपर पट्टी होने के कारण उसे कुछभी दिखाई नही दे रहा था। तो उसने अपनी सारी जान कानों में लगाकर अपने इर्दगिर्द हो रहे हलचलों को और आवाजोंकों सुन रहा था। ओ पूरी तरह से बौखला गया था।
            इतनेमें उसके कानोपर नेपोलियन की आवाज़ पड़ी," सैनिको,तैयार हो जाओ ... अपने बाणों का निशाना लगाओ और छोड़ दो." यह सुनतेही दुकानदार के मन,दिमाग और शरीरमें कुछही क्षणोमे मरनेकी भावना निर्माण हुई। वह उस प्रकारकी घबराहट को मेहसूस करने लगा।उसके शरीरमें कंप होने लगा।उसकी आँखोमेसे आँसू बहने लगे। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा।वह अभी मरही गया है ऐसा मनाने लगा और अपनी सांसोकोभी ख़तम हुआ होता जानने लगा। इतना सबकुछ भयंकर उसके साथ हो रहा था,इतनेमें उसने किसी की नजदीक आनेकी आहट सुनी। किसीने झटसे उसके ऑंखोंकी पट्टी खोली। उसने आँखे खोली,देखा तो सामने नेपोलियन खड़ा था। नेपोलियन उसकी आँखोमे गहरा देखकर बोला," तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब मिल गया होगा?" इतना बोलकर हँसते हुये नेपोलियन वहाँसे निकल गया। दुकानदार को  उसके सवाल का जवाब खाली सुनके नही बल्कि मेहसूस करके मिला था।जवाब की अनुभूति ली थी।
               जिंदगीमें अगर हमे बदलाव लाना है। जीवनके हरएक क्षेत्र में परिवर्तन लाना है तो हमें उसे महसूस करना होंगा। उसका अनुभव करना पड़ेगा। उसे जानना होंगा, क्योकि एक अनुभव ही इंसान को बदल सकता है। कई बार हम सिर्फ किताबें पढ़ते है।लोंगों को सुनते है।यहाँ वहाँ से जानकारी इकट्ठा करते है। यह सब आपके तभी काम आ सकता है अगर आप इसका इस्तेमाल अपनी रोजमर्रा की जिंदगीमें करेंगे। इसका अनुभव करेंगे। अनुभवसेही ज्ञान बढ़ता है, खाली सुननेसे,देखनेसे या फिर बोलनेसे नहीं। आशा है हम सभी अभी से,इसी क्षणसे जीवन मूल्यों को व्यवहारमें लाकर उनका अनुभव लेंगें। जीवन का असली  मज़ा अनुभूतिमे ही है।

Let's experience the life.

Mr. Abhijeet Manav.
       (Mind trainer & NLP practitioner)

Thursday, 3 January 2019

HAVE AN OUTLET


                             प्रवाहित व्हा 
                       आपण सर्वांनी शालेय जीवनात मृत समुद्राचे नाव निश्चितच ऐकले असेल.वास्तविक तो एक खाऱ्या पाण्याचा अवाढव्य तलाव आहे ,ज्यात जॉर्डन नदीचे पाणी मिसळले जाते पण,या समुद्रात कोणत्याही प्रकारचे जीवन नाही.सामान्यपणे सर्वप्रकारच्या पाणी साठ्यांमध्ये आढळणारे लहान मोठे सजीव,मासे वा वनस्पती यापैकी काहीही या ठिकाणी आढळत नाही. यांतील क्षाराचे प्रमाण इतके प्रचंड आहे की मानवाचे शरीर यातील पाण्यावर सहजपणे तरंगू शकते.अशा प्रकारे कोणत्याही जीवनास प्रतिकूल असल्यामुळेच यास मृत समुद्र असे म्हटले जाते.
            या मृत समुद्राच्या अगदी जवळच उत्तरेला गॅलिलि नावाचा असाच भला मोठा समुद्र आहे की जो सर्व प्रकारच्या सजीवांच्या वाढीस अनुकूल असलेने तो जीवन संपन्न आहे. यात विविध प्रकारच्या रंगी बेरंगी वनस्पती व जलचर आढळतात. इस्रायलच्या विविध भागातून हजारो पक्षी या ठिकाणी स्थलांतरित होतात शिवाय अनेक प्रकारचे बगळे इथे पाहायला मिळतात. या गॅलिलि समुद्रातही जॉर्डन या नदीचेच पाणी मिसळले जाते.
        मृत समुद्र आणि गॅलिली समुद्र हे एकाच प्रकारच्या भूभागात आढळतात जेथील हवामान,तापमान व जमीन सारखीच आहे शिवाय दोघांमध्ये एकाच नदीचे पाणी मिसळले जाते मग एका समुद्रात जीवन आहे तर दुसऱ्यात कसलेच जीवन नाही, असे का?
         तर, गॅलिली समुद्रात एका मार्गाने येणारे पाणी समुद्रात मिसळल्यानंतर, दुसऱ्या मार्गाने बाहेर प्रवाहित केले जाते तर मृत समुद्रात पाणी स्वीकारले जाते पण कोणत्याही मार्गाने ते बाहेर प्रवाहित केले जात नाही.बाहेर टाकले जात नाही. ते एकाच ठिकाणी साठवले जाते यातील जवळपास ७ लाख टन पाण्याचे दररोज बाष्पीभवन होते यास्तव क्षाराचे प्रमाण अधिक होऊन जीवन निर्मितीची एकूणच संभाव्यता संपते.
        वास्तविक गॅलिली आणि मृत समुद्रातील फरक मानवाचे जीवन प्रगल्भ आणि सुखी करणारे एक तत्व शिकविते ते म्हणजे जीवनाचे सार हे फक्त घेण्यात वा स्वीकारण्यात नसून ते देण्यात,स्वीकारलेले पुढे प्रवाहित करण्यात आहे.
       जिवंतपणा एका अवस्थेत थांबून साठवण्यात,स्वतःपर्यंत मर्यादित ठेवण्यात नसून सतत प्रवाहित असण्यात आहे. जॉर्डन नदीच्या अविरत चाललेल्या प्रवाहाप्रमाणेच आपल्याही जीवनात खूप सुंदर गोष्टी येत सतत येत असतात, जसे लोकांकडून मिळणारे प्रेम ,आदर,मान- सन्मान,आपुलकी,स्नेह,मदत,
आधार तसेच त्यांच्या सहवासातून मिळणारे ज्ञान,आनंद, सुख,शांती व समाधान या सगळ्यांचा खरा आस्वाद तोच घेऊ शकतो जो हेच ज्ञान, प्रेम,आदर व समाधान आपल्या वागण्या बोलण्यातून म्हणजेच दररोजच्या कृतीयुक्त व्यवहारातून इतरांपर्यंत प्रवाहित करून इतरांच्या जगण्यात जिवंतपणा निर्माण करतो.
         असं म्हटलं जातं की सुख वाटल्याने वाढते. आपण आपल्या वाट्याला आलेले सुख वाटून स्वतःही सुखी होवूयात व इतरांनाही सुखी करूयात, प्रवाही होऊयात. वाहत राहूयात...

Give a lot to receive a lot....


Mr.Abhijeet Manav.
(Mind trainer & NLP practitioner)

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