Tuesday, 30 July 2019

ART OF LEAVING

      
getting the life purpose the inner peace
   छोड़ने की कला


                दो सन्यासी लोंगोंको ज्ञान बाटते हुए गाँव गाँव घूम रहे थे। उनमें से एक बहुतही अनुभवी था और एक जवान और अभी अभी सन्यासी बना था। जवान सन्यासी उस बड़े को अपना गुरु मानता था। उनकी हर एक बात ध्यान से सुनता और उसके मुताबिक ही जीवन बीताता था। एक दिन वे दोनों एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे। रास्ते में दोनों के बीच कई सारी अद्यात्मिक और धार्मिक बाते चल रही थी। बड़ा सन्यासी छोटे को कई तरह की अच्छी बातें बता रहा था।
            चलते चलते वे एक नदी किनारें पहुँच गए। दूसरे गाँव जाने के लिए उन्हें नदी को पार करना था। उन्हें ख़ुद ही उसे पार करना था, क्योंकि वहाँ पर नाव की सुविधा नहीं थी। वैसे नदी काफी गहरी भी नही थी तो दोनों नदी पार करने के लिए पानी मे उतर गए। उन्होंने थोड़ा अंतर ही पार किया था, की उन्हें पिछेसे किसीकी पुकार सुनाई दी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ एक स्त्री थी और उसे भी नदी पार करनी थी। वह महिला उन सन्यासियोसे मदत माँग रही थी। उस स्त्री को देख और उसकी माँग सुनकर वह जवान सन्यासी आगे की तरफ चल पड़ा, लेकिन दूसरा सन्यासी पीछे आया और उस स्त्री को अपने काँधे पर उठाकर नदी पार करने लगा। उस स्त्री को नदी पार करवाकर वे दोनों आगे बढ़ने लगे।
      दूसरा गांव आने तक बड़े सन्यासी के ध्यान में आया कि दूसरा सन्यासी चुपचाप ही था। वह पहलेकी तरह बात नही कर रहा था। वह उदास और उखड़ा हुआ था। दोनों गाँवमे पहुँच गये। गांववालों ने उनका स्वागत किया। उन्हें भोजन देकर उनके रहने का इंतज़ाम किया। दोनों सन्यासी खाना खाकर सोने चले गए, लेकिन अभी तक दोनोंमें बात नही हो रही थीं। बड़े सन्यासी ने सुबह मामला निपटने की सोची और वह सोने गया। देर रात जब उसकी आँखें खुली तो उसने देखा कि जवान सन्यासी नही सोया था। वह जाग रहा था। आख़िर कार बड़े ने उसे पूछा," मैं तुम्हे दोपहर से देख रहा हूँ, तुम कुछ अजीब सा बर्ताव कर रहे हो। क्या हुआ? क्या चल रहा है तुम्हारे अंदर?"  वह बोला," मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ रहकर गलती कर रहा हूँ। तुम्हारे करनी और कथनी में कोई तालमेल नही हैं।" बड़े ने पूछा," तुम्हे इसका अनुभव कब और कैसे हुआ?" जवान सन्यासी बोला," तुम्हने हमेशा स्त्री से दूर रहनेका उपदेश किया हैं, लेकिन कल दोपहर जब तुम्हने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की तभी मैं तुम्हारा दोगलापन समज़ गया।" इस बातपर वह सन्यासी हसकर बोला," मैं उस स्त्री को तो नदी किनारे तभी छोड़ आया मगर तुम उसे अभी तक लेकर चल रहे हो।"

       हम सभी उस सन्यासी की तरह कई सारी बातों का बोझ बे मतलब कितने सालों तक ढाते रहते है। खुदके साथ साथ औरों के बारेमें भी गलत सोच को हम हमेशा लंबे समय तक साथ लेकर चलते हैं। लोगोंके प्रति घृणा,नकारात्मक सोच तथा गुस्सा जिस बात से होता है उसे बरसों बीत जाते हैं लेकिन हैं उन्हें इस तरह मन में रखते है मानो वह घटना अभी घटी हैं। इसका विपरीत परिणाम औरों पर कभीभी नही होता मगर हम खुदपर होता है। इसका नकारात्मक असर हमारी शरीरपर  तथा मन पर भी होता है। हमारी मनःशांति भंग हो जाती हैं।

     जिंदगी का उद्देश्य खुश रहना है। शांति को प्राप्त करना है। आनंद लेना हैं और इसके लिये हमे वर्तमान में जीना होंगा। भूतकाल में घटी घटनाओं को भूलकर भविष्य की ओर निर्विकार मन से चलना होंगा। इसलिए हमें छोड़ देने की कला अवगत करनी चाहिए।

Let's leave and go ahead.

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