आईना
एक शिष्य बरसों अपने गुरु की सेवा में लीन था। सच्चे मन से और पूरी श्रद्धा के साथ वह बिना थके हुए दिन रात गुरुसेवा में लगा रहा। वह अपने गुरु से माँ बाप की तरह ही लगाव रखता था और गुरु भी उसे और शिष्यों से विशेष मानते थे।वह गुरु की हर एक बात अपने मन में उतारता था। बरसों सुनी गुरुबाणी से उसे अच्छा ज्ञान प्राप्त हुआ था। अपनी तपश्चर्या और अध्यात्मिक अभ्यास पूरा करने के पश्चात वह गुरु से अंतिम विदाई लेने के लिये पहुंचा। गुरु ने अपने प्रिय शिष्य के लिये एक भेंट तैयार रखि थी। उसने ज़ुककर गुरु को प्रणाम किया। गुरु ने उसे आशिर्वाद दिया और उसके हाँथ में अपनी भेंट रखि और कहाँ," मैं तुम्हें एक अद्वितीय भेंट दे रहा हूँ। यह एक अद्भुत आईना हैं। तुम इसमे व्यक्ति का मन पढ़ सकतें हो। मन मे चल रहे विचारों को साथ साथ उसमें बसें विकारों को भी समझ सकते हो।"
शिष्य गुरु की भेंट से बहुत खुश हुआ। गुरु ने दिये गए आइनेकी विशेषज्ञता आजमाने के लिए सबसे पहले उसनें गुरु के सामनेही वह आईना पकड़ा। गुरु का मन आईने में पढ़कर वह हक्काबक्का रह गया। गुरु के मन में उसे ईर्ष्या, अहंकार,द्वेष जैसे कई विकार दिखाई दिए। वह निराश हुआ। सोचने लगा जिसे अपना गुरु कहाँ, जिससे अध्यात्मिक ज्ञान लिया वह इंसान अभीतक विकारों से मुक्त नहीं। उसे गुरु के पास रहने का,उसकी सेवा करने का पछतावा होने लगा। वह उसी क्षण आश्रम छोड़ अपने घर के रास्ते निकल पड़ा।
रास्ते में मिलने वाले हर एक व्यक्ति के सामने वह आईना पकड़ कर उनका मन पढ़ता रहा। उसे हर एक व्यक्ति में विकार दिखाई दिए। वह हर एक का मन जानकर उनका मज़ाक उड़ाने लगा। उनको कुछ न कुछ उपदेश भी देने लगा। वास्तविक उसे लोगों का मन पढ़ने में मजा आने लगा था। मानो की वह आईने के ज़रिए लोगों के साथ खेल रहा था। उसे सारा समाज विकारों से भरा और बुरा लगने लगा था।
रास्ते मे ढ़ेर सारे लोगों का मन पढ़कर आखिरकार वह अपने घर लौटा। उसके आने की पहल होते ही उसके माता-पिता घर के द्वार पर उसका स्वागत करने हेतु उपस्थित हुए। उसने ज़ुककर उनको प्रणाम किया और घर मे प्रवेश किया। कुछ देर पश्चात उसने वह अद्भुत आईना अपने थैले से निकाला और अपने माता पिता के सामने खड़ा हुआ। उसने उनके सामने आईना पकड़ा तो उनका मन भी विकारों से पीड़ित दिखाई दिया। अपने माता पिता का विकार पीड़ित मन देख वह बहुत निराश हुआ और सीधे फिरसे गुरु के पास चला गया।
गुरु के सामने उनकी दी हुई भेंट रखकर बोला,"मैन आप जैसे महान ज्ञानी से लेकर मुझे जन्म देने वाले मेरे माता पिता तक हर एक व्यक्ति के मन को इसमें पढ़ा है। हर एक व्यक्ति विकारों से लतपत हैं। हर कोई बुरा हैं। मुझे तो लगता है कि सारी दुनिया ही बुरी हैं।"
शिष्य के इस बात पर गुरु हँस पड़े और बोले," तुमनें हरएक के सामने आईना पकड़ा। उनका मन पढ़ा। उनके भीतर पड़े विकारों को भी समझा, अच्छा किया! लेकिन, क्या तुमनें यह आईना तुम्हारे ख़ुदके सामने पकड़ा?
शिष्य बोला," नहीं, मैंने तो कभीभी यह आईना मेरे सामने नही पकड़ा इतना तो क्या, मेरे मन मे ऐसा कोई विचार भी नही उठा।" गुरु मुस्कुराते हुए बोले," मैन यह आईना तुम्हे खुदका मन पढ़ने के लिए दिया था, ना कि दुनिया का। तुम्हें इसके सहारे ख़ुद से परिचित होना था। खुदको समझना था। तुम्हने तो अपना सारा समय व्यर्थं किया और मेरी भेंट भी व्यर्थं गवाई।
गुरु की इन बातोंसे प्रेरित होकर उसने झटसे आईना ख़ुदके सामने पकड़ा। खुदका मन आईने में पढ़ शिष्य के पैरों तले जमीन सरक गई। उसको अपने भीतर विकारों का ढेर दिखाई दिया। दुनियां के विकारों को देख जो मन ही मन मे और खुले आम दुनियाको बुरी कहने वाला, अपनी असलियत जानकर हैरान रह गया।
हम सब के अंदर इसी तरह का शिष्य रहता है जो दुनियां की बुराइयां गिनता हैं लेकिन खुदकी बुराईयों से कोसों दूर हैं। हम दुनियाको नापते हैं। उनके विकारों पर टिका टिप्पणी करते हैं। कई बार लोगों को उन विकारों से मुक्ति पाने का रास्ता भी दिखाते हैं लेकिन ख़ुदको विकारों से मुक्त करने की बात दिमाग में भी नहीं आती। खुदकी बुराइयों को भी अच्छाइयाँ समझकर जीवन बिताते हैं। कई लोगों मे तो ख़ुदमे विकार होने का भी घमंड होता है। दुनियां की तरफ आँखे फाड़ कर देखने वाला ख़ुदके तरफ देखने की बात हो तो अंधा हो जाता है। दूसरों के बुरे कर्मों से दुखी होनेवाला ख़ुदके कर्म कैसे है यह जानना भी नही चाहता। दूसरों के दुष्ट विचार-विकारों पर चर्चा और विश्लेषण करनेमें समय को बर्बाद करने से अच्छा रहेगा कि हम खुद पर ध्यान रखें और खुद को उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ाते रहे।
जीवन मे दो बातें तय है, या तो आप बढेंगे,या फिर सड़ेंगे। अगर बढ़ना है तो ख़ुद पर ध्यान देना पड़ेगा। खुदसे परिचित होना पड़ेगा। ख़ुदको समझना पड़ेगा। स्वयं में बसे विकारों से खुद लड़ना पड़ेगा,और यह जीवनभर चलनेवाली प्रक्रिया है। इसको समझे,इसका आंनद ले,जीवन सुखी बनाये।
महान संत कबीर कहतें है।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय;
जब दिल खोजूं मैं अपना,मुझसे बुरा न कोय।
