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राजीव एक बहुतही अच्छा इंसान था। वह हर एक के काम आता था। उसके शहरमें शायद ही कोई ऐसा होगा जो उसके अच्छे बर्तावसे से अनजाना होगा। सारे लोग उसे प्यार करते थे।उसका आदर सन्मान करते थे। जैसे उसके चाहने वाले थे वैसेही उसके कुछ विरोधी भी थे,गोपाल उनमेंसे एक था। गोपाल को राजीव की एक भी बात अच्छी नहीं लगती थी।वह उससे ईर्ष्या करता था। राजीव की लोकप्रियता बढ़ रही थी। गोपाल ख़ुद को राजीव के मुकाबले कम महसूस करने लगा था। उसकी ईर्ष्या और द्वेष इतना बढ़ गया कि वह अब राजीव की बुराई करने लगा था। जो उसके मन में था वह बाहर आने लगा। वह अब खुलेआम लोगोंके बीच राजीव के बारेमें अनापशनाप बोलने लगा। वह राजीव के बारेमें अफवाएं फ़ैलाने लगा। हर एक के पास जाकर उसके चरित्र और व्यवहार के बारेमें असम्बद्ध बातें करने लगा। कुछही दिनोंमें गोपालने पूरे शहरमें राजीव का नाम बुराईयों से जोड़ दिया था। उसकी कही हुई बातोंको कुछ लोग सच भी मानने लगे थे।
गोपाल की यह बातें राजीव को सहन नही हो रही थी, तो उसने गोपाल के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज किया। जब बात कोर्ट में गयी तो गोपाल घबरा गया। उसने पहले तो अपने ऊपर लगाएं इल्ज़ाम झुटे है ऐसा कहना सुरु किया। लेकिन जब लोगों ने जवाब दिए तो उसने अपना जुर्म कबुल किया। और माफी माँगने लगा।वह कहने लगा कि वे सिर्फ टिप्पणियां थी,उसको लोगों ने इतना गंभीर नही लेना चाहिए था।जज ने गोपाल को सज़ा देने की ठान ली,लेकिन सजा उसको दूसरे दिन सुनाई जानी थी। तब तक जज ने उसको कोरे कागज़ पे राजीव के बारेमें जो कुछ भी कहा था वह सब लिखनेको कहा और घर जाते वक्त उन्ही कागजोको रास्तेमें फेंकनेके लिये कहाँ। गोपालनेभी वैसेही किया लिखे हुए कागज रास्तेपर यहाँ वहां फेंके और घर चला गया।
दूसरे दिन गोपाल जज के सामने सजा सुनने के लिए हाजिर हुआ। जज साहबने सजा सुनाने से पहले गोपाल को कल रास्तेमें फेंके हुए कागज उठाकर लाने के लिए कहा। गोपाल तो हड़बड़ा गया यह कैसे हो सकता था। उसने कहाँ,"अभी तो वही कागज वापस लाना असंभव हैं। वे तो अभी हवा के साथ पूरे शहर में यहाँ वहां फैल गए होंगें।" इसपर जज साहब बोले,"जिस तरह तुम कल फेंके हुए कागज नहीं वापिस ला सकतें उसी तरह राजीव के बारेमें कहे बुरे शब्द भी तुम वापिस नहीं ला सकतें।चाहें तुम किसीभी सजाके लिए तैयार क्यों ना हो।" गोपाल गर्दन झुकाये शर्मिंदगी से अपने आपको कोसता रह गया।
हम कभी कभी जाने अनजाने में लोगों के बारेमें बिना सोचे समझे, सच की खोज किये बिना ऐसेही बातें करतें हैं। अफवाये फैलाते हैं, जो कई दफा लोगोंकी जिंदगी भर कमाई हुई इज्जत,मान सन्मान, पहचान को खत्म कर देती हैं। हमें जानभुज कर ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। अगर हम किसीके बारेमें अच्छा नहीं बोल सकते तो भी सही है लेकिन लोगोंकी बुराई नहीं करनी चाहिए।चलते वक्त अगर पैर फिसल जाए तो अपने आपको संतुलित किया जा सकता है लेकिन अगर ज़बान फिसले तो आप शब्दों को नहीं संभल सकतें। उन्हें पूरी सजगता के साथ,सोच समझकर इस्तेमालमें लाना पड़ेगा।
Let's control your tongue for the better use of it.
Mr. Abhijeet Manav.
( Mind Trainer & NLP Master Trainer)