अद्वितीय
एक दिन सुबह एक कुलीन और साहसी सामुराई झेन मंदिर में प्रवेशित हुआ। वह वहाँके झेन साधुको मिलना चाहता था। वैसे तो उसका वहाँपर हमेशा आनाजाना था। झेन साधु कुछ छात्रोंके साथ बातचीत कर रहे थे। जैसेही उनका ध्यान सामुराई पर पड़ा,उन्होंने उसको पास बुलाया।पास जाकर उस साधुको प्रणाम करके सामुराई बोला," मैं जबभी आपको देखता हूँ, मेरे मन मे खुदके प्रति हीनता का भाव जागृत होता है।मैंने आजतक कितनों को हराया है। कई बार मौतका सामना किया हैं।पर, मैं जब आपको ध्यान करते हुए देखता हूँ तो मेरा जीवन किसी काम का नहीं ऐसा प्रतीत होता हैं। ऐसा क्यों?" इसपर झेन साधु मुस्कुराये और बोले," थोड़ा धीरज रखों, मैं एक बार मुज़से मिलने आये सभी लोगों को मिलता हू और उसके पश्चात तुम्हारे सवाल का जवाब देता हू।"
सामुराई वहीं उस झेन साधुके पास बैठ गया। दिनभर बहुत सारे लोग आते जाते रहे।साधु हरएक को सलाह देता था।शाम होंनेका समय आया था फिरभी लोग आ रहे थे। इतने लोगों के साथ बात करनेके बावजूद भी सामुराई को साधु के चेहरेपर उतनाही उत्साह दिख रहा था जितना सुबह था। सूरज ढल चुका था। शाम हो गयी थी। लोगों का आना जब थम गया तब सामुराई साधुके पास गया और फिरसे जवाब देनिकी बात की। झेन साधु सामुराई को लेकर आपने कमरेमें चले गए। दोनों खिडकीके पास खड़े हो गए। साधुने आसमान की ओर अंगुली उठाई और बोले," देखों इस पूनम के चाँद को किस तरह अँधेरेको चीरता हुआ रोशनी फैला रहा है। यह पूरी रातभर इसी तरह सृष्टिको उजाला देगा। फिर सुबह होंगी सूरज निकलेगा। सूरज के रोशनी में सबकुछ साफ़ साफ़ दिखाई देगा। यह धरती , आसमान,पर्बत, पेड़ पत्ते सबकुछ वैसे के वैसे नजर आयेंगे जैसे वे अभी नहीं दिख रहे है। तो क्या कभी चाँदको सूरज को देखकर,उसके निखार को देखकर उसके जैसा प्रकाशमान नही होने पर क्या खुदके प्रति हीनता का भाव मेंहसूस करना चाहिये?" सामुराई बोला," नही, बिल्कुल नहीं क्योंकि दोनोंमें कोईभी ईर्षा नही हो सकती। हर एक का अपना सौंदर्य है।सृष्टि में दोनों का महत्व अपनी अपनी जगह हैं। इन दोनोंका होना हरएक जीव को एकसमान प्रभावित करता हैं।"
साधुने हसकर सामुराई के तरफ देखा और कहा," यही तुम्हारे सवाल का जवाब है।हम दोनो भी एक समान है। बस अपनी अपनी धारणाओसे जीवन बिता रहे हैं और इस दुनियाको औरभी खूबसूरत बनानेका प्रयास कर रहे हैं।" सामुराई अब हिनताके भावसे उठकर समानता के भाव मे रूपांतरित हो गया था। साधु को उसी भावमें प्रणाम करके मंदिरसे बाहर निकला।
हम जाने अनजाने में खुदकी औरों के साथ तुलना करते रहते हैं और कभी ख़ुदको हीन मानते हैं या फिर कभी औरोको हीन समझते हैं। यहाँ का हर एक जीव अद्वितीय हैं।अनूठा हैं। हर एक के भीतर समानरूपसे उर्जाका वहन होता हैं। ना कोई कम है ना ज्यादा। हर एक समान हैं। औरोके साथ तुलना किये बिना,हमारे अंदर पड़े स्त्रोतोका सही उपयोग करकेहि हम इस दुनियाको और भी खूबसूरत बना सकते हैं।
Let's be unique....
#AbhijeetManav.
Very nice
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