Tuesday, 30 July 2019

ART OF LEAVING

      
getting the life purpose the inner peace
   छोड़ने की कला


                दो सन्यासी लोंगोंको ज्ञान बाटते हुए गाँव गाँव घूम रहे थे। उनमें से एक बहुतही अनुभवी था और एक जवान और अभी अभी सन्यासी बना था। जवान सन्यासी उस बड़े को अपना गुरु मानता था। उनकी हर एक बात ध्यान से सुनता और उसके मुताबिक ही जीवन बीताता था। एक दिन वे दोनों एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे। रास्ते में दोनों के बीच कई सारी अद्यात्मिक और धार्मिक बाते चल रही थी। बड़ा सन्यासी छोटे को कई तरह की अच्छी बातें बता रहा था।
            चलते चलते वे एक नदी किनारें पहुँच गए। दूसरे गाँव जाने के लिए उन्हें नदी को पार करना था। उन्हें ख़ुद ही उसे पार करना था, क्योंकि वहाँ पर नाव की सुविधा नहीं थी। वैसे नदी काफी गहरी भी नही थी तो दोनों नदी पार करने के लिए पानी मे उतर गए। उन्होंने थोड़ा अंतर ही पार किया था, की उन्हें पिछेसे किसीकी पुकार सुनाई दी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ एक स्त्री थी और उसे भी नदी पार करनी थी। वह महिला उन सन्यासियोसे मदत माँग रही थी। उस स्त्री को देख और उसकी माँग सुनकर वह जवान सन्यासी आगे की तरफ चल पड़ा, लेकिन दूसरा सन्यासी पीछे आया और उस स्त्री को अपने काँधे पर उठाकर नदी पार करने लगा। उस स्त्री को नदी पार करवाकर वे दोनों आगे बढ़ने लगे।
      दूसरा गांव आने तक बड़े सन्यासी के ध्यान में आया कि दूसरा सन्यासी चुपचाप ही था। वह पहलेकी तरह बात नही कर रहा था। वह उदास और उखड़ा हुआ था। दोनों गाँवमे पहुँच गये। गांववालों ने उनका स्वागत किया। उन्हें भोजन देकर उनके रहने का इंतज़ाम किया। दोनों सन्यासी खाना खाकर सोने चले गए, लेकिन अभी तक दोनोंमें बात नही हो रही थीं। बड़े सन्यासी ने सुबह मामला निपटने की सोची और वह सोने गया। देर रात जब उसकी आँखें खुली तो उसने देखा कि जवान सन्यासी नही सोया था। वह जाग रहा था। आख़िर कार बड़े ने उसे पूछा," मैं तुम्हे दोपहर से देख रहा हूँ, तुम कुछ अजीब सा बर्ताव कर रहे हो। क्या हुआ? क्या चल रहा है तुम्हारे अंदर?"  वह बोला," मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ रहकर गलती कर रहा हूँ। तुम्हारे करनी और कथनी में कोई तालमेल नही हैं।" बड़े ने पूछा," तुम्हे इसका अनुभव कब और कैसे हुआ?" जवान सन्यासी बोला," तुम्हने हमेशा स्त्री से दूर रहनेका उपदेश किया हैं, लेकिन कल दोपहर जब तुम्हने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की तभी मैं तुम्हारा दोगलापन समज़ गया।" इस बातपर वह सन्यासी हसकर बोला," मैं उस स्त्री को तो नदी किनारे तभी छोड़ आया मगर तुम उसे अभी तक लेकर चल रहे हो।"

       हम सभी उस सन्यासी की तरह कई सारी बातों का बोझ बे मतलब कितने सालों तक ढाते रहते है। खुदके साथ साथ औरों के बारेमें भी गलत सोच को हम हमेशा लंबे समय तक साथ लेकर चलते हैं। लोगोंके प्रति घृणा,नकारात्मक सोच तथा गुस्सा जिस बात से होता है उसे बरसों बीत जाते हैं लेकिन हैं उन्हें इस तरह मन में रखते है मानो वह घटना अभी घटी हैं। इसका विपरीत परिणाम औरों पर कभीभी नही होता मगर हम खुदपर होता है। इसका नकारात्मक असर हमारी शरीरपर  तथा मन पर भी होता है। हमारी मनःशांति भंग हो जाती हैं।

     जिंदगी का उद्देश्य खुश रहना है। शांति को प्राप्त करना है। आनंद लेना हैं और इसके लिये हमे वर्तमान में जीना होंगा। भूतकाल में घटी घटनाओं को भूलकर भविष्य की ओर निर्विकार मन से चलना होंगा। इसलिए हमें छोड़ देने की कला अवगत करनी चाहिए।

Let's leave and go ahead.

Sunday, 28 July 2019

ART OF LEAVING

             
getting the life purpose the inner peace
   छोड़ने की कला


                दो सन्यासी लोंगोंको ज्ञान बाटते हुए गाँव गाँव घूम रहे थे। उनमें से एक बहुतही अनुभवी था और एक जवान और अभी अभी सन्यासी बना था। जवान सन्यासी उस बड़े को अपना गुरु मानता था। उनकी हर एक बात ध्यान से सुनता और उसके मुताबिक ही जीवन बीताता था। एक दिन वे दोनों एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे। रास्ते में दोनों के बीच कई सारी अद्यात्मिक और धार्मिक बाते चल रही थी। बड़ा सन्यासी छोटे को कई तरह की अच्छी बातें बता रहा था।
            चलते चलते वे एक नदी किनारें पहुँच गए। दूसरे गाँव जाने के लिए उन्हें नदी को पार करना था। उन्हें ख़ुद ही उसे पार करना था, क्योंकि वहाँ पर नाव की सुविधा नहीं थी। वैसे नदी काफी गहरी भी नही थी तो दोनों नदी पार करने के लिए पानी मे उतर गए। उन्होंने थोड़ा अंतर ही पार किया था, की उन्हें पिछेसे किसीकी पुकार सुनाई दी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ एक स्त्री थी और उसे भी नदी पार करनी थी। वह महिला उन सन्यासियोसे मदत माँग रही थी। उस स्त्री को देख और उसकी माँग सुनकर वह जवान सन्यासी आगे की तरफ चल पड़ा, लेकिन दूसरा सन्यासी पीछे आया और उस स्त्री को अपने काँधे पर उठाकर नदी पार करने लगा। उस स्त्री को नदी पार करवाकर वे दोनों आगे बढ़ने लगे।
      दूसरा गांव आने तक बड़े सन्यासी के ध्यान में आया कि दूसरा सन्यासी चुपचाप ही था। वह पहलेकी तरह बात नही कर रहा था। वह उदास और उखड़ा हुआ था। दोनों गाँवमे पहुँच गये। गांववालों ने उनका स्वागत किया। उन्हें भोजन देकर उनके रहने का इंतज़ाम किया। दोनों सन्यासी खाना खाकर सोने चले गए, लेकिन अभी तक दोनोंमें बात नही हो रही थीं। बड़े सन्यासी ने सुबह मामला निपटने की सोची और वह सोने गया। देर रात जब उसकी आँखें खुली तो उसने देखा कि जवान सन्यासी नही सोया था। वह जाग रहा था। आख़िर कार बड़े ने उसे पूछा," मैं तुम्हे दोपहर से देख रहा हूँ, तुम कुछ अजीब सा बर्ताव कर रहे हो। क्या हुआ? क्या चल रहा है तुम्हारे अंदर?"  वह बोला," मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ रहकर गलती कर रहा हूँ। तुम्हारे करनी और कथनी में कोई तालमेल नही हैं।" बड़े ने पूछा," तुम्हे इसका अनुभव कब और कैसे हुआ?" जवान सन्यासी बोला," तुम्हने हमेशा स्त्री से दूर रहनेका उपदेश किया हैं, लेकिन कल दोपहर जब तुम्हने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की तभी मैं तुम्हारा दोगलापन समज़ गया।" इस बातपर वह सन्यासी हसकर बोला," मैं उस स्त्री को तो नदी किनारे तभी छोड़ आया मगर तुम उसे अभी तक लेकर चल रहे हो।"
       हम सभी उस सन्यासी की तरह कई सारी बातों का बोझ बे मतलब कितने सालों तक ढाते रहते है। खुदके साथ साथ औरों के बारेमें भी गलत सोच को हम हमेशा लंबे समय तक साथ लेकर चलते हैं। लोगोंके प्रति घृणा,नकारात्मक सोच तथा गुस्सा जिस बात से होता है उसे बरसों बीत जाते हैं लेकिन हैं उन्हें इस तरह मन में रखते है मानो वह घटना अभी घटी हैं। इसका विपरीत परिणाम औरों पर कभीभी नही होता मगर हम खुदपर होता है। इसका नकारात्मक असर हमारी शरीरपर  तथा मन पर भी होता है। हमारी मनःशांति भंग हो जाती हैं।
     जिंदगी का उद्देश्य खुश रहना है। शांति को प्राप्त करना है। आनंद लेना हैं और इसके लिये हमे वर्तमान में जीना होंगा। भूतकाल में घटी घटनाओं को भूलकर भविष्य की ओर निर्विकार मन से चलना होंगा। इसलिए हमें छोड़ देने की कला अवगत करनी चाहिए।

Let's leave and go ahead.

HAVE AN OUTLET


                        प्रवाहित बने
                                       आपने स्कूलमें जरूर मृत समुद्र के बारेमें पढ़ा होगा। दरअसल यह एक नमकीन पानी वाली बड़ी झील है, जिसमे जॉर्डन नदी का पानी मिश्रित होता हैं। इस पानी मे किसी भी प्रकार का जीवन नही है। आमतौर पर पाये जाने वाले समुद्री छोटे या बड़े ऐसे कोईभी जीव यहाँ पर नही है। इसकी क्षारीयता इतनी है कि मानव इसमें बिना दुबे सतह पर ही तैर सकता है। इस प्रकार किसी भी जीवन को यह अनुकूल नहीं है, इसलिए इसको मृत समुद्र कहा जाता है।
   
       इस मृत समुद्र के नजदीक ही उत्तर दिशा में गैलिली नाम का समुद्र है। यह सभी प्रकार के जीवों से सम्पन्न है।इसमें हजारो तरह के जीव है। यहाँपर विविध प्रकारके जलचर और वनस्पति दिखाई देते हैं। विशेष बात यह है कि इसमें भी जॉर्डन नदीका ही पानी मिश्रित होता है।
      मृत समुद्र और गौलिलि समुद्र दोनों एकहि भूभाग में पाये जाते है जहाँपर वातावरण, तापमान और ज़मीन एक समान है। शिवाय दोनोंमें जॉर्डन नदी ही का पानी मिश्रित होता है। फिर भी एक मे जीवन है और एक मे नहीं, ऐसा क्यों?
        गैलिली समुद्र में एक तरफ से आने वाला पानी दूसरी तरफ से बाहर निकल जाता है। प्रवाहित होता है। लेकिन मृत समुद्र में आने वाला पानी किसी भी तरह से बाहर निकलता नही। वह एक ही जगह पर इकट्ठा होता है और धूप की वजह से पानी बाष्पाशीत होकर केवल क्षार पीछे रह जाते है।जो जीवन के लिए प्रतिकूल होता है।
      इन दो समुद्रोंमें पाये जानें वाला फर्क हमे जीवन का एक महान तत्व सिखाता है, की जीवन का अर्थ केवल लेने में नही बल्कि देने में है। जो पाया है उसे प्रवाहित करने में है। जॉर्डन नदी की तरह हमारे जीवनमें कई तरह की अच्छी बातें आते रहती है। अपना परिवार, मित्र या समाज इन सभीसे मिलने वाला प्यार,आदर,मदत या फिर सन्मान यह सब हमे औरो को भी देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात है ज्ञान की जो केवल बाँटने से ही बढ़ता है।
  चलिए जो कुछ भी अच्छा हमारे पास है उसे बहने दे।

 Let's give the world to receive.

LOVE YOUR WORK

                                                                                              काम से प्रेम करे

                नदी किनारे खड़े पर्बत पर एक छोटासा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोगों का हमेशा पर्बत से नीचे आना जाना रहता था। लेकिन यह काम हर एक के बस का नही था क्योंकि पर्बत बहुत ही ऊँचा था। साथ ही ऊपर और नीचे आने जाने वाले रास्ते बहुत कठिन थे। लोग इस समस्यासे ग्रस्त थे लेकिन उनके पास कोई चारा नही था।
      एक दिन एक इन्सान दोपहर के वक्त कड़ी धूप में उस पर्बत पर चढ़ रहा था। उसके पास एक छोटासा थैला था।उसने कुछ ही अंतर पार किया होंगा की उसको थकान महसूस होने लगीं। वह कुछ देर रुका और फ़िर चढ़ने लगा। थोड़ा और ऊपर चढ़तेहि वह पूरी तरह से थक गया। उसने धीरज छोड़ दिया।वह सोचने लगा,अगर उसके पास वह थैला नही होता तो वह आराम से पर्बत पर पहुँच जाता। उसके मन में उस थैले के प्रति घृणा पैदा होने लगीं। उसका और ऊपर जानें का मन नही हो रहा था।
        वह कभी ऊपर देख रहा था तो कभी नीचे देख रहा था। लेकिन इतनी कड़ी धूप में कोई आने जानें की उम्मीद भी नही थी। थोडीही देर में उसके ध्यान में आया कि कोई तो पर्बत चढ़ रहा था। वह जो कोई भी था बहुत तेजी से औऱ बिना रुके थके पर्बत पर चढ़ रहा था। उसने ध्यान से देखा तो वह एक दस साल की लड़की थी और उसकी बाहोंमे एक चार साल का बच्चा भी था। बड़े आराम से, बिना थके वह लड़की उस बच्चे को लेकर पर्बत चढ़ रही थी। जैसे ही वे दोनों इंसान के पास आये,उसने उन दोनों को रोका और उस लड़की से पूछा," मैं इतनी देर से तुम्हे इतनी आसानी से पर्बत चढ़ते देख रहा हूँ। मैं इस छोटे से थैले को लेकर इतना परेशान हूँ और तुम इस बच्चे को गोद में उठाकर यह ऊंचा पर्बत बिना थके चढ़ रही हो। क्या तुम्हें इस बच्चे का बोझ महसूस नहीं होता?"  उस व्यक्ति के इस सवाल पर वह दस साल की बच्ची थोड़ा गुस्सा होकर ही बोली," आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? यह बच्चा मेरा भाई है और मैं इससे बहुत प्यार करती हूँ। इससे मेरा इतना लगाव है कि यह इससे भी बड़ा होता तब भी मुझे इसका बोझ महसूस नही होता।" इंसान को उस लड़की को बच्चे को उठाकर इतने आराम से पर्बत चढ़ने के कारण समज़ में आया। वह उस लडक़ी का उस बच्चे के प्रति प्यार था जो उसे उसका बोझ कुछ भी नही लग रहा था। उस इंसान को अपने थैले की प्रति इटनासा भी प्यार नही था। इसी वजह से वह थक गया था।
          हमारे साथ भी बिल्कुल ऐसेही होता हैं। जिस काम से आप लगाव नही ऱखते, प्यार नही करते वह काम आप आसानीसे और लंबे वक्त के लिए नही कर सकते। किसी भी काम को उसके अंजाम तक पहुचाना हैं तो उस काम के प्रति प्रेम होना जरूरी है। प्यार से किया हुआ काम मुश्किल नही होता हैं और वह काम पूरा करतें वक्त आने वाली हर मुश्किल आसानी में बदल जाती हैं। काम से प्रेम करने से ही जीवन खुशहाल बनेंगा।
     कई लोगों को तो जीवन भी बोझ लगता है क्योंकि वे जीवन से लगाव नही ऱखते। उन्हें जो मिला है उससे प्यार नही करतें। आपके पास जो कुछ भी उसे प्यार करें। जिंदगी एक सुहाना सफर हो जायेंगी। सारा जीवन हँसते हँसाते गुजर जाएगा।

Let's love whatever we are doing.

WORLD IS THE WAY YOU LOOK AT IT

                     जैसे दृष्टि वैसे सृष्टि 

       एक घुड़सवार गाँव के गेट पर खड़ा था। उसके चेहरे पर उत्सुकता के साथ साथ संदेह का भाव भी था। जैसे वह किसी की तलाश कर रहा था, वैसे ही एक बूढ़ा व्यक्ति उसे दिखाई दिया। वह तुरंत उसके पास पहुंचा गया और बोला,"मैं जहाँ से आ रहा हूँ वह गाँव छोड़कर इस गाँव मे रहने की सोच रहा हूँ। क्या आप मुझे इस गाँव के लोगों के बारेमें बतायेंगे?" बूढ़े उलटकर उससे पूछा," जिस गांव को तुम छोड़ना चाहते हो उस गाँव के लोग कैसे हैं?" बूढ़े के इस सवाल पर घुड़सवार नाराज़ होकर बोला," उस गांव के लोग बड़ेही घमंडी और घटिया हैं। वे बिल्कुल अच्छे नही है। समजदार नही हैं। मैं उनसे तंग आकर ही गांव छोड़ रहा हूँ।" इस जवाब पर बूढ़ा बोला," तुम्हे इस गाँवमे भी ऐसेही लोग मिलेंगे।" यह सुनकर वह घुड़सवार आगे निकल पड़ा।
   थोड़ी ही देर में और एक इंसान वहाँ पहुंच गया। वह भी इस उसका पिछला गांव छोड़ उस गांव में रहना चाहता था। उसने उसी बूढ़े को गांव के बारे में पूंछा। बूढ़े ने फ़िरसे वही सवाल किया जो घुड़सवार को किया था। उसपर वह इंसान बोला," वह गाँव तो स्वर्ग से भी सुंदर है। वहाँ जे लोग बहुत ही अच्छे हैं। उन सबमें मानवता कूटकूट कर भरी है। मैं तो वह गांव छोड़ना नही चाहता मगर मैं काम की वजह से मजबूर हूँ।" यह सुन बूढ़ा बोला," तुम बिल्कुल सही लोगों के बीच आये हो। यहाँ के लोग भी बहुत अच्छे है। वे तुम्हे पूरा सहकारी करेंगे इसमें कोई शंका नही।"
          हमारी दुनिया हमारी दृष्टि निर्धारित करती है। जिस तरह आप लोगो से व्यवहार करते है बिल्कुल उसी तरह लोग आपसे व्यवहार करते है।यदि हम खुदके बारे में सकारात्मक सोच रखेंगे तो लोगोंके साथ भी हम वैसेही पेश आएंगे।

NEW VISION

         
                          नयी दृष्टि
                   उन्नीस साल का एक लड़का ट्रेन में बैठकर अति उत्साहित होकर खिड़की से बाहर देख रहा था। वह ख़ुशीसे जोर जोर के चीख रहा था। उसके चेहरेपर उतावले पन के भाव थे। वह अपनी पिता की ओर देखकर बोला," पिताजी देखिए ना सभी पेड़ पीछे की ओर दौड़ रहे है। बादल हमारे साथ भाग रहे है।" उसके पिताजी भी उसके साथ मजे कर रहे थे। उनके चेहरे पर आनंद के भाव थे। वे दोनों अलग ही दुनियां में थे।
     उस लड़के का यह व्यवहार देख बाकी सारे लोग हैरान थे। उनको बच्चे का वर्तन एबनॉर्मल लग रहा था। उनमें से एक ने उसके पिताजी से कहाँ,"आप अपने बच्चे को अच्छे अस्पताल में क्यो नही दिखाते?" मुस्कुराते हुए उन्होंने उस इंसान की तरफ देखा और बोले," हाँ, हम अभी अभी सीधे अस्पताल से आ रहे हैं। मेरा बच्चा जन्म से अंधा था। उसे आज ही नई आँखे मिली है। उसे नई दृष्टि मिली हैं।"  उसके पिता की यह बात सुनकर सब शर्म से चुपचाप हो गए। उनकी क्रोध की भावना करुणा में बदल गयी।
       हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि हम लोंगोंको गलत तरीके से आंकते हैं। हमने लोगोंके बारे मे ऐसी धारणाएं बनायीं है जिन्हें किसी भी वास्तविकता का आधार नही होता है। हम लोगोंके दिखने से, बोलने से, व्यवहार से और उनके कपड़ों से उनका मूल्यांकन करते हैं, जो बिल्कुल गलत है। लोगोंके बारे मे की गई गलत राय प्रभावी,मानवीय और उत्पादक नही होगी।
  जब तक दिमाग की आँखे नही खुलेंगी तब तक कोई भी हकीकत नहीं देख सकता।

Secret of success

                           सफलता का रहस्य

                   सुकरात विश्व प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक थे जिन्होंने मानव जाति को प्रगति का विचार दिया। उस समय हर एक को वह उनकी समस्या हल करने का आधार प्रतीत होता था। एक दिन दोपहर एक युवा सुकरात के सामने खड़ा हुआ। उसके आने का कारण पूछे जाने पर उसने सुकरात को सफलता का रहस्य बताने का आग्रह किया। सुकरात ने बिना कुछ कहे उसे अगले दिन गाँव के बाहर नदी किनारे मिलने के लिए कहा।
     युवा बहुत उत्साहित था। उसे सफलता पाने का सरल और आसान तरीका मिलेगा ऐसा लगता था। अगले दिन सुकरात और युवक नदी किनारे पहुँचे। जब युवक ने फिर से उनसे सफलता का रहस्य पूछा, तो सुकरात ने उसका हाथ पकड़ा और उसे नदी में ले गए। कुछ अंतर अंदर जाते ही सुकरात ने उसकी गर्दन जोर से पकड़ी और उसे पानी मे डुबोया। युवा के साथ यह अचानक घटने के कारण वह हैरान हो गया। उसे तो कुछ भी समझ नही आ रहा था। वह ऊपर उठने की कोशिश कर रहा था। लेकिन सुकरात पूरी ताकद से उसे फिर पानी मे लोटता था। यह सब कुछ ही पल चल रहा था। युवक ने सुकरात को जोर से धक्का दिया और पानी से ऊपर उठा। वह जोर जोर से हाफ़ रहा था। वह सुकरात को गालियां देने लगा। वह शांत होते ही सुकरात ने पूंछा," जब तुम पानी मे थे तब तुम्हे सबसे ज्यादा किसकी जरूरत थी?" युवक बोला," पानी मे जब मेरा जी घूट रहा था तब मुझे सबसे ज्यादा साँस लेने की जरूरत थी।"
    सुकरात बोले," जिस तरह तुम्हे पानी मे साँस लेने की तीव्र इच्छा थी, बिल्कुल उसी तरह ही सफल होने की तीव्र इच्छा रहेंगी तभी तुम सफल हो सकते हो।" सुकरात की बात अच्छी तरह समझ कर और सफलता का रहस्य जान कर वह लौट गया।
        सफलता का कोई शॉर्टकट नही होता हैं। सफलता पाने की तीव्र इच्छा शक्ति और उसके मुताबिक ख़ुदको कार्य करने के लिये हमेशा प्रेरित करने से ही सफलता मिलेंगी। सफलता के लिए अपार कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती हैं। अपनी क्षमता को पहचान कर उसको पूरी तरह से सफलता के प्रति उपयोग में लाना चाहिए। अंतिम क्षण तक आशावादी और सकारात्मक रहना चाहिए। जितना जीने के लिए साँस जरूरी हैं उतनी ही तीव्र इच्छा होंगी तभी आप सफल बनेगें।

Let's have a burning desire to succeed.

Wednesday, 24 July 2019

PREPARATION

 
                                तैयारी 
                   
                एक बूढ़ा किसान लगभग चालीस साल खेती कर रहा था। वह अपने किसान होनेपर गर्व महसूस कर रहा था। आज तक उसने कई तरह के अनाज उगाए थे।उसने खेतीके साथ साथ पशुपालन भी किया था। जिसमे गायें और मुर्गियां थी। अपनी खेती और पशुयों का वह अच्छा ख़याल रखता था। उसे अपने खेतिपर जान से भी ज्यादा प्यार था। लेकिन कुछ दिनों से बुढ़ापे की वज़ह से वह थकान महसूस कर रहा था और इसी कारण वह खेती की तरफ़ अपना ध्यान नहीं दे पा रहा था। कुछ ही दिनों में इसका विपरीत परिणाम खेती और पशुओं पर होने लगा था।
         बड़ी सोच के बाद उसनें अपनी खेती का खयाल ऱखने के लिए किसी और को नियुक्त करने का निर्णय किया। उसनें कई लोंगोंको बताया लेकिन कोई भी वहाँ काम क़रनेको तैयार नहीं था। लोगों का वहाँ पर काम नही करनेका कारण उस क्षेत्र में हमेशा उठने वाला तूफ़ान था। तूफान की वज़ह से उन्हें बहुत सतर्क और हमेशा काम मे रहना पड़ता था, और नुकसान भी होता था।किसान ने काम करने के लिए कोई मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी तभी एक दिन एक युवक उसके पास पहुंचा। बुढ़े किसान को थोड़ा धीरज मिला। किसान ने उससे पूछताछ की और खेती के कामकाज का अनुभव पूछा। तब उसने कहा," मुझे खेती करने का ज्यादा अनुभव नहीं है लेकिन जब ज़ोरोका तूफ़ान उठता है तब मैं सुख और चैन से सो सकता हूँ।" किसान को उसके कम अनुभव से दिक्कत नहीं थी लेकिन उसकी तूफ़ान उठनेपर सोनेकी बात अजीब लगी। किसान के पास और कोई चारा नहीं था, तो उसे काम पर रख दिया।
    थोड़े ही दिनों में उस युवक ने कई काम सीखें। वह पूरी ताकद से काम करता था। खेत और पशुओ का पूरा ख़याल रखता था। बूढ़े किसान को अभी उसपर पूरा भरोसा हो गया था। लेकिन उसकी तूफान आने पर सोने की बात हज़म नही हो रही थी। अभी तक कोई तूफान भी नही उठा था। किसान ने सोचा जैसे वह वहाँ पर मन लगाकर काम कर रहा था, तो वह बदल भी जाएगा और तूफ़ान आने पर भी काम करेगा।
          सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन एक दिन तूफान उठा। तूफान हमेशा रात के समय ही उठता था। किसान और वह युवक  दोनों सो रहे थे। देर रात तूफान आया। हवाएं चलने लगीं। किसान नींद से उठा।उसको खेतों और पशुयों की चिंता होने लगीं। वह जितना हो सके उतना जल्दी युवक के रूमके पास चला गया। उसने दरवाजा खटखटाया, अंदर से कोई आवाज नही आयीं। बाहर तूफ़ान बढ़ रहा था। किसान को गुस्सा आने लगा। उसने खिड़की से ज़ाक़कर देखा तो युवक बड़े आराम से सो रहा था। वह गहरी नींद में था। बुढ़े की आवाज शायद ही उसको सुनाई दे रही थी। किसान को और भी गुस्सा आया। उसको युवक को वहाँ पर रखने का पछतावा होने लगा। वह ख़ुद खेत की तरफ निकल पड़ा। उसको खेत और पशुयों की चिंता हो रही थी। उसने कुछ भी बचने की आशा छोड़ दी। रास्ते मे वह युवक को कोसता रहा। गालियां देने लगा। और सुबह होते ही उसको यहाँ से बाहर निकाल देनेका निश्चय किया। उसको इस तरह तूफ़ान में खेत पर जाने का अनुभव था क्योकि आज तक क़भी भी तूफ़ान आनेपर वह आराम से नही सोया था।
           वह उदास होकर वहाँ पहुंचा। जैसे ही उसने परिस्थिति का जायजा लेना सुरु किया उसका गुस्सा ठंडा होने लगा। उसने देखा कि युवक ने तूफ़ान का सामना करने की पूरी तैयारी पहले से ही कि थी। उसनें घास को इकठ्ठा कर अच्छी तरह से ढका था। पशुओं को तबेले में सुरक्षित जगह पर बाँध दिया था। साथ ही मुर्गियों को भी सुरक्षित किया था।  तूफान के बाद होनेवाली वर्षा का पानी खेत से बाहर निकल जाने के लिये सुरंग भी तैयार किया था। यह सब देख किसान खुश हुआ और युवक की तूफ़ान उठनेपर सुख चैन से सोनेवाली बात को अच्छी तरह से समज़ गया।
       युवक तूफ़ान के आने पर आराम से सो सकता था, क्योंकि तूफ़ान से लड़ने की तैयारियां उसने पहलेही कर ली थीं।

   क्या आपको पता हैं,

आपके जीवनमें ऐसे कौन कौन से तूफान हमेशा उठते है?

 आनेवाली जिंदगीमें कौन कौन से तूफान उठ सकते हैं?

          और

 क्या आपने आपके जिंदगी में उठने वाले तूफानोंमें सुख चैन से सोने की तैयारियां की है?

    अग़र हमे तूफ़ान की तरह ही जीवन मे अचानक पैदा होने वाली समस्याओं का सामना करना हैं और सुख चैन से जीना है तो हमे वैसेही तैयारियां करनी चाहिए। यह समस्याएं आर्थिक, व्यावसायिक, व्यक्तिगत,सामाजिक याफिर पारिवारिक भी हो सकती हैं।आज के इस भागदौड़ भरी जिंदगी में नौकरियों की समस्या है और उसके चलते आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ता है। अचानक होने वाली बीमारियों के कारण सेहत की समस्याएं उठती है। तनावपूर्ण लाईफ़ स्टाईल के कारण चिंता,एंग्जायटी, डिप्रेशन ऐसी भयानक मानसिक बीमारियों का सामना करना पड़ता है। अगर तूफ़ान का आगाज नहीं समझेगे और ख़ुदको तैयार नही करेंगे तो जिंदगी में सुख चैन नही रहेगा।
    यही समय हैं तूफानों को समझने का और ख़ुदमे बदलाव लाने का जो आपको कठिन परिस्थितियों में भी आंनद देगा।

Let's prepare ourselves to face the storms in the life.



Mr. Abhijeet Manav
Certified Mind Trainer,
NLP Practitioner (NFNLP..U.S.A.)
Life Skills Coach
Corporate Trainer

Sunday, 7 July 2019

PEACE

                               मनःशांति
                 एक राजा अपनी अद्यात्मिक सोच की वज़ह से पूरे राज्यमें मशहूर था। वह प्रजाको भी अद्यात्मिक राह पर लाने के लिए हमेशा कुछ ना कुछ करते रहता था। वह चाहता था कि हर एक इंसान सुखी और शांतिपूर्ण तरीकेसे जीवन बिताये। इसी कारणवश उसनें एक चित्रकारी प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसमे उसने ऐसा चित्र बनानेकी घोषणा की जिससे शांति प्रतीत हो, साथ ही जीतनेवाले को ढ़ेर सारा ईनाम देनेकी भी घोषणा की। राज्य के हर एक कोने तक यह बातें पहुंचायी गई। थोड़े ही दिनोंमें कई जानेमाने चित्रकारों ने  अपनी अपनी तस्वीरें राजमहल की ओर भेज दी। राजा ने उन सभी तस्वीरों का प्रदर्शन लगाया और लोंगोंको देखनेके लिए निमंत्रित किया।
              राजा ने अपने राजमहल की आर्ट गैलरी में सारी पेंटिंग्स लगायी थी। राज्य के हर एक हिस्से से लोग प्रदर्शन देखने आये थे। लोंगोंको वे सभी पेंटिंग्स अच्छी लगती थी। हर एक चित्र किसी ना किसी तरीकेसे शांति को प्रतीत कर रहा था। कई चित्रों में ध्यान करतें हुये साधुओं को चित्रित किया था। कईयों ने शांत बहती हुई नदी और विशाल समंदर को चित्रित किया था। कई चित्रों में प्रकृतिको प्रतिबिम्बित किया था। हर एक चित्र अच्छा था। उनमेंसे एक चित्र लेकिन हर एक को अच्छा लगा था। और लोंगोंको वहीं चित्र प्रतियोगिता जीतेगा ऐसा लगता था। उस चित्र में चित्रकारने एक शांत तालाब के किनारे एक हसीन और हिमसे लतपत पर्बत को चित्रित किया था। उस पर्बतपर कई सारे रंगों के पेड़ फूल थे। तालाब के किनारें भी हसीन और बड़े वृक्ष थे। उस हिमाच्छादित पर्बत का सुंदर प्रतिबिंब तालाब में पड़ा था। सारा माहौल शांतिपूर्ण था। चित्रित किया हुआ सारा परिसर गहन शांति को प्रतीत कर रहा था। उस चित्र को देख हर एक शांति का अनुभव कर रहा था। लोंगोंको पूरी गारंटी थी कि राजा इसी चित्र को विजयी चित्र घोषित करेगा।
              दूसरे दिन सुबह सभी लोग राजमहल में प्रतियोगिता का परिणाम जानने के लिए उपस्थित हो गए। राजा भी प्रतियोगिता जीते हुए चित्र को लेकर वहां उपस्थित हुआ। राजा ने जैसे ही वह चित्र लोगोंके सामने रखा, लोग उस चित्र को देख आश्चर्य हुये। वह तो लोगोंकी अपेक्षासे बिल्कुल अलग था। राजा ने जो चित्र चुना था वह तो किसी भी प्रकार से शांति को प्रतीत नही कर रहा था। उस चित्र में चित्रकारने एक ऊँचा बंजर, वृक्षहिंन,रूखा पर्बत उतारा था। उपरसे उस पर्बत पर काले ढ़ग छाये हुए थे। उनमें भयावह बिजली चमक रही थी, मानो वह अभी किसी जो जलाकर राख कर रही थी। जोरों का तूफ़ान उठा था। तूफ़ान पर्बतपर जोरों से टकरा रहा था। साथ ही मूसलाधार वर्षा भी चल रही थी। लोग राजा का चुनाव देख परेशान हो गए। कइयोको लगा कि शायद राजाने गलतीसे इसे यहाँ पर लाया होंगा। लोगोंकी परेशानी राजाके ध्यान में आते ही उसने सभी को चित्र को फिर से पूरे ध्यान से देखने का आवाहन किया। जब सभी ने ध्यानसे चित्र को परखा तो उन्होंने कुछ ऐसा देखा जो सही में शांति के परम अनुभूति को प्रतीत कर रहा था। उस चित्र में खड़े रूखे पर्बतपर एक छोटा पेड़ था। कुछ ही टहनियों का और कुछही पत्तो का। उस पेड़ पर एक छोटासा कोसला था और उसमें दो चिड़िया थी। चिड़िया इतने बड़े तूफ़ान और घनी बारिश में भी पूरी तरह शांत दिखाई दे रही थी। उनके आसपास का माहौल बिल्कुल अशांत था, उसमे भयावहता कुटकूटकर भरी हुई थी। फिर भी दोनों चिड़िया खुदमे शांति का परम अनुभव कर रही थी। राजा ने लोगोंसे कहा कि शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नही करती। परिस्थिति कितनीं भी मुश्किल और हिंसक क्यों न हो शांति का अनुभव अंदर से होना चाहिए।और यही एक कारण था जिसने इस चित्र को जीताया था। राजा की यह दृष्टि देख सभी प्रसन्न हुए और शांति का सही मतलब समझ कर चित्रकारकी कल्पकता की सराहना करने लगें।

        हम सभी लोग मनःशांति की खोज बाहरी दुनियां में करतें हैं। हमारी शांति दूसरों की मनोदशा पर निर्भर होती हैं। हम परिस्थितियों के अधीन होते है ना कि परिस्थितिया हमारी अधीन होती हैं। हम शांति के खोज में पूरी दुनिया घूम आते है। चारों धाम की यात्रा पर निकलते हैं। नदी, तालाब,समंदर,पर्बत यहां तक की हिमालय की चोटी तक घूम आते हैं। फिर भी हमे शांति का अनुभव होना मुश्किल होता है क्योंकि शांति की खोज खुदके अंदर करनी चाहिए और वही हर कोई भूल करता है। हम लगातार शांति का माहौल ढूँढ़ते रहते है। कभी कभी आसपास का माहौल शांत होता है फ़िर भी हम शांति महसूस नही करतें क्योंकि शांति बाहर से अंदर की ओर नही, बल्कि अंदर से बाहर की ओर बहती हैं। उस प्रकारकी आंतरिक शांति को पाना हर एक के लिए मुमकिन है। लेकिन उसके लिए जीवन की तरफ सही रुख़ अपनाना जरूरी है। वास्तविक इस तरह की मनःशांति पाने के लिये हमें केवल हमारे बाहर उठे तूफान की ओर देखनेका सही दृष्टिकोण, सकारात्मक सोच और उदारता रखनी पड़ेंगी। हमे सजगतापूर्वक जीवन जीना होंगा।विपश्यना ध्यान और माइंडफुलनेस जैसी जीवन शांति को प्राप्त कर देनिवाली विद्याओं का अभ्यास करना पड़ेगा।हमसें होने वाली हर एक क्रिया तथा प्रतिक्रिया के पीछे केवल शांति को प्राप्त करनेका ही उद्देश्य होता है और जीवन की सार्थकता शांतिपूर्ण जीवन जीने में ही है।
   आशा है कि आप ख़ुदमे शांति की खोज करेंगें क्योकि शांति आपको वहीं प्राप्त होंगी।

Let's dive into ourselves to get the peace.

EXCEL TRAINING SYSTEM. 


Mr. Abhijeet Manav

Certified Mind Trainer, 
NLP practitioner (NFNLP, U.S.A.)
Life skills coach,
Motivational speaker,
Corporate Trainer.

Monday, 1 July 2019

SELF TRANSFORMATION

         
                           स्वयं परिवर्तन

                     शहरका एक नामी बिजनेसमैन अपनी आँखों की बीमारी से हैरान था।कई महीनों से उसकी आंखोमें दर्द था। कई बड़े अस्पतालों में उसने अपना इलाज करवाया था। बड़े बड़े डाक्टरोंसे इलाज करवाके भी वह दर्दसे मुक्त नही हुआ था। दवाईया लें लेकर वह ऊब गया था। उसनें ठीक होनेकी उम्मीद ही छोड़ दी थी।
      एक दिन उसके एक मित्रने उसे किसी संन्यासी के बारेमें बताया। वह सन्यासी हिमालय से आया था और वह लोगोंकी असाध्य बीमारियों का इलाज करता था।
बिजनेसमैन तुरंत उसके पास चला गया और उसे अपनी बीमारी के बारे में बताया। सन्यासी ने उसकी पूछताछ की और उसे अजीबोगरीब  इलाज बताया। सन्यासी ने कहा की आनेवाले एक सालभर उसे सभी रंगों को टालकर सिर्फ हरे रंग पर ही अपना लक्ष देना पड़ेगा। अगर वह हरा रंग देखता रहेगा तो वह पूरीतरह से दर्दमुक्त होंगा ऐसा उसे बताया गया। वह अमीर बिजनेसमैन बीमारीमुक्त होनेके लिए कुछ भी क़रनेको तैयार था।
         उसने घर लौटते ही अपने सेक्रेटरी को बुलाया और दर्जनभर पेंटरोको काम पर लगवाया। बाज़ार से हरे रंग के शेकडो डिब्बे मंगवाए और पूरा घर हरे रंग में रंगवाया। गेट से लेकर किचन तक हर एक चीज़ जो उसे दिखाई देती थी उसने हरे रंग में बदलकर रख दी। जहाँ कही भी नजर पड़ती वहाँ सिर्फ हरा रंग दिखाई देता था।उसने खुद हरे रंग के कपड़े खरीदे साथ ही साथ अपने घरवाले और नौकरों को भी हरे रंग के कपड़े खरीदने पर मजबूर किया। अपने बग़ीचेसे पिले, लाल और अलग रंग के पौधें और फूल सब उखाड दिए और उनकी जगह केवल हरे रंग के पौधें रख दिये। उसके इर्दगिर्द सिर्फ हरा रंग ही दिखाई देता था। उसके सभी दोस्त, रिश्तेदार,पड़ोसी यहाँतक आनेजाने वाले सभी यह देख हैरान हो गए थे, लेकिन वह अमीर बिजनेसमैन ख़ुदको अच्छा महसूस कर रहा था। उसका दर्द अभी कम हो गया था।
          तकरीबन दो महीने बाद वह सन्यासी फिर उसी जगह लौट आया। यह बात बिज़नेसमैन को पता लगतेहि उसने अपने सेक्रेटरी को वहाँ भेज सन्यासिको अपने घर बुलवाया। सन्यासी उस सेक्रेटरी के साथ गाड़ीमे बैठ निकल पड़ा। अमीर आदमीके बंगले के बाहर गाड़ी रुकी और जैसेही सन्यासी गाड़ी से उतरा उस वहाँ के वॉचमैन ने उसके हाथोंमें हरे रंग का ड्रेस रख उसे पहनने को कहा। सन्यासी तो हक्काबक्का रह गया। उसने सेक्रेटरी के तरफ देखा और फिर वॉचमेन के तरफ़, तो उन्होंने भी हरे रंग के कपड़ें पहने थे। सन्यासी ने जब पूछताछ की तो उसे पता चला कि यह वहाँ का नियम ही था,की हर एक आनेजाने वालेको सिर्फ हरे रंग का ड्रेस ही पहनना होंगा। सन्यासी कपड़े बदल अंदर चल पड़ा। वह जैसे जैसे आगे बढ़ता  गया तब उसे हर एक चीज़ हरे रंग में ही नजर आने लगीं। वहाँ कोई और रंग होनेकी गुंजाइश नहीं थीं।  वह घर के भीतर जा पहुंचा,वहाँपर भी सबकुछ हरा था। वह जिस सोफ़े पर बैठा था वह भी हरा था। इतनेमे वह बिजनेसमैन वहाँ उसका स्वागत करने पहुंचा तो वह भी हरे रंग के कपड़े पहनें था। अब तो सन्यासी गहन विचार में पड़ गया। उसनें बड़ी उत्सुकता से बिजनेसमैन को इस हरे रंग के कारनामें के बारे में पूछा तो वह अमीर बोल पड़ा," स्वामी,यह आप ही कि देन हैं। आपहिने मुझे दर्दसे मुक्त होने के लिये लगातार हरे रंग की ओर ध्यान देने के लिए, देखने के लिए कहा था।तबसे मैंने यह सब हरे रंग में बदला है और अभी मैं अच्छा महसूस करता हूं।"
             यह सुन सन्यासी बोला," तुम अच्छा महसूस करतें हो यह जानकर मुझे अच्छा लगा। मेरे इलाज का तुम्हे फायदा हुआ यह भी बड़ी बात हैं लेकिन उसके लिए तुम्हे यहाँ सबकुछ हरे रंग में बदलनेकी कोई जरूरत नहीं थीं। अगर तुम्हने अपनी आंखों पर हरे रंग की काँचवाल चश्मा लगाया होता तो भी तुम्हे यह सब हरा दिखाई देता और तभी भी तुम्हे इतनाही अच्छा महसूस होता।"
          सन्यासी की यह बात सुन बिजनेसमैन अपनी मूर्खता से परिचित हो, सिर पीटते हुए पछतावा करने लगा।
            वास्तविक रूपमें अमीर आदमी की यह गलती हम सभी मे दिखाई पड़ती हैं जब हम ख़ुदको अच्छा महसूस करने के लिये खुदके बजाय औरोमे बदलाव करनेकी अपेक्षा करतें है। कई लोग हमेशा यही मानते आए है कि उनके मानसिक तनाव और उससे निर्मित दर्दभरे जीवन का इलाज दुसरोंको बदलने में हैं। यह सबसे गलत बात हैं।दरसअल हमे हमारा नजरिया बदलना चाहिए। हमे हमारे सोच में बदलाव लाना चाहिए। दूसरोंको बदलनेमे शायद आपकी पूरी जिंदगी गुज़र जाएंगी लेकिन फिर भी आप सुख, शांति,चैन नही पा सकते जब तक आप ख़ुदको नही बदलतें। दूसरोंके बदलनेपर अपने सुखों को निर्भर रखना मूढ़ता ही हो सकती हैं। सही सुकून ख़ुदको बदलनेमे हैं। दूसरोंको बदलने के प्रयास में अपने वक्त की बर्बादी कर पछतावा करनेसे स्वयं परिवर्तन में अपनी ऊर्जा लगाइये। यही दर्दमुक्ति का सही रास्ता है।

Let's change ourselves first...

EXCEL TRAINING SYSTEM. 

Mr. Abhijeet Manav
Certified Mind Trainer, 
NLP practitioner (NFNLP, U.S.A.)
Life skills coach,
Motivational speaker,
Corporate Trainer.


Beyond Habits: The Power of an Identity Shift

  Beyond Habits: The Power of an Identity Shift Most people approach change backward. They say, "If I go to the gym every day (Action),...