नयी दृष्टि
उन्नीस साल का एक लड़का ट्रेन में बैठकर अति उत्साहित होकर खिड़की से बाहर देख रहा था। वह ख़ुशीसे जोर जोर के चीख रहा था। उसके चेहरेपर उतावले पन के भाव थे। वह अपनी पिता की ओर देखकर बोला," पिताजी देखिए ना सभी पेड़ पीछे की ओर दौड़ रहे है। बादल हमारे साथ भाग रहे है।" उसके पिताजी भी उसके साथ मजे कर रहे थे। उनके चेहरे पर आनंद के भाव थे। वे दोनों अलग ही दुनियां में थे।
उस लड़के का यह व्यवहार देख बाकी सारे लोग हैरान थे। उनको बच्चे का वर्तन एबनॉर्मल लग रहा था। उनमें से एक ने उसके पिताजी से कहाँ,"आप अपने बच्चे को अच्छे अस्पताल में क्यो नही दिखाते?" मुस्कुराते हुए उन्होंने उस इंसान की तरफ देखा और बोले," हाँ, हम अभी अभी सीधे अस्पताल से आ रहे हैं। मेरा बच्चा जन्म से अंधा था। उसे आज ही नई आँखे मिली है। उसे नई दृष्टि मिली हैं।" उसके पिता की यह बात सुनकर सब शर्म से चुपचाप हो गए। उनकी क्रोध की भावना करुणा में बदल गयी।
हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि हम लोंगोंको गलत तरीके से आंकते हैं। हमने लोगोंके बारे मे ऐसी धारणाएं बनायीं है जिन्हें किसी भी वास्तविकता का आधार नही होता है। हम लोगोंके दिखने से, बोलने से, व्यवहार से और उनके कपड़ों से उनका मूल्यांकन करते हैं, जो बिल्कुल गलत है। लोगोंके बारे मे की गई गलत राय प्रभावी,मानवीय और उत्पादक नही होगी।
जब तक दिमाग की आँखे नही खुलेंगी तब तक कोई भी हकीकत नहीं देख सकता।
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