Sunday, 14 April 2019

SACRIFICE

                                   त्याग

                       भारतभूमि अनेक राजाओंकी पराक्रम और महानता की साक्षी रही हैं। भारतवर्ष को इतना वैशिष्ट्यपूर्ण और विश्वमें पराक्रमी बनानेमें यहाँ के कई राजाओका महत्व पूर्ण योगदान रहा है। उनमेंसे एक थे मौर्य साम्राज्य को पूरे भारतवर्ष में फैलाने वाले राजा चंद्रगुप्त मौर्य। वेह बड़ेही साहसी,पराक्रमी और न्यायप्रिय थे। चंद्रगुप्त ने अपने गुरु चाणक्य  के साथ, एक नया साम्राज्य बनाया, राज्यचक्र के सिद्धांतों को लागू किया, एक बड़ी सेना का निर्माण किया और अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।
           यह बात तब की है, जब राजा चंद्रगुप्त मौर्य,राजा धनानन्द की बेटी दुर्धरा से प्यार करते थे। चंद्रगुप्त राजकुमारी दुर्धरा से बहुत प्यार करते थे। बहुत लगाव रखते थे। लेकिन जब यह बात गुरु चाणक्य के पास पहुँची तो उन्होंने राजा चंद्रगुप्त मौर्य को दुर्धरा से दूर रहनेकी सलाह दी। चंद्रगुप्त राजकुमारी से दूर रहने लगें लेकिन उन्हें इस दुरी से बहुत दुःख होता था।तभी एक दिन चंद्रगुप्त चाणक्य से बोले," आचार्य,इस मौर्य साम्राज्य की नींव रखने के लिए और भारतवर्ष में अखंड साम्राज्य का विस्तार करने के लिये मुझे अपनी प्राणोंसे प्रिय दुर्धरा से दूर रहना पड़ रहा हैं। मेरे जीवन मे उससे दूर रहने से ज्यादा और कोई  कठिन काम नही हो सकता। भारतवर्ष के निर्माण प्रति और सम्राट बनने के लिए मुझे अगर यह त्याग और बलिदान नहीं करना पड़ता तो?"
       चाणक्य बोले," तो फिर भारतवर्ष के हर एक घरमें सम्राट पैदा होता।"
            गुरु चाणक्य का यह जवाब किसीभी बड़े कार्य के पीछे का बड़ा त्याग दर्शाता हैं।अगर कोई भी चीज बिना किसी त्याग, समर्पण और कड़ी मेहनत के सिवा हासिल होती तो वह कोई भी पा सकता है। हर कोई जिंदगी में सफ़ल बनना चाहता है।जिन्दगीका हर एक सपना पूरा करना चाहता है। हर कोई ऊंची उड़ान भरना चाहता हैं।हर कोई अपनी पहचान बनाना चाहता हैं। जिन्दगीके हर एक सुख को अपनाना चाहता है लेकिन यह सब उसीको सम्भव होता हैं जो यह सब हासिल करने के लिये जिन्दगीके कुछ प्राणप्रिय सुखोंको त्यागता हैं। अपने सपनों को हकीकत में लाने के लिये त्याग करने के लिये तैयार होता हैं।
       कभी कभी हम ऐसी क्रियायें करना छोड़ देते है, जो हमे करनी ही नही चाहिए और हम यह सोंचते हैं कि हमने त्याग किया है।जैसे अगर हमने कभी दूरदर्शन देखना बंद किया तो हम सोचते हैं की हमने त्याग किया है। जब हम लोगोंके बारे में भलाबुरा बोलना छोड़ देते हैं,अनापशनाप बोलना छोड़ देते हैं या फिर बेमतलब के गप्पें करना छोड़ देते है तो हमे लगता है की हमने त्याग किया हैं।सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल,बेवज़ह यहां वहां घुमने पर पाबंदी और ऐसी कई सारी क्रियाओंसे खुद को दूर करने का मतलब त्याग नहीं होता।अगर एखाद विद्यार्थी परीक्षा के दौरान दूरदर्शन पर चल रही मनचाही फ़िल्म छोड़कर अपनी पढ़ाई करेगा तो क्या वह त्याग कहलायेगा ? नही बिल्कुल नहीं।
               इसीलिए हम सभीको त्याग का सही मतलब मालूम होना जरुरी हैं। त्याग का मतलब होता है कि ख़ुदको ऐसी बातों से दूर रखना जो बातें हमारे जीवन मे मुल्य पैदा करती है।जो बातें हमारे जीवन का अहम हिस्सा होती है।कभी कभी उनका त्याग करनेसे कई सारी खुशियों से ख़ुदको वंचित होना पड़ता है। उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है।लेकिन खुदकी और आनेवाली कई पीढ़ियों की उन्नति और सुखों को ध्यान मे रखकर अपनी ही खुशियों का हमे गला घोंटकर जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता हैं। वास्तविक रूप में यह बात मनचाही नहीं होती लेकिन उस वक्त अपने खुद के चाहत से ज्यादा लक्ष्य को हासिल करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है। त्याग वह है जो भगवान महावीर और भगवान गौतम बुद्ध ने अंतिम ज्ञान पाने हेतू अपना राजमहल छोड़कर किया था। त्याग वह है जो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरजी ने किया था। भारतीय समाजमें समानता लाने हेतु अपने निजी स्वार्थ को छोड़,अपने परिवार और बच्चों की परवाह किए बिना,अपने स्वास्थ्य की चिंता किये बिना दिनरात काम करते रहे  और अपने लक्ष्य को पाया।यह त्याग हैं।
          जीवन मे कुछ पाने हेतु आवश्यक बातों को त्यागना किसीके भी बस की बात नही हैं। उसके लिये अपने लक्ष्य के प्रति जीवन से ज्यादा लगाव होना चाहिए।आप खुदकी जिंदगी बनाने के लिये और आनेवाली कई पीढ़ियों को ऊर्जा देने के लिये क्या क्या त्यागना चाहेंगें?

Let's sacrifies something today for better tomorrow.

Mr.Abhijeet Manav.

Saturday, 6 April 2019

THE GOOD DEED

                             
                           अच्छे कर्म   

                           शीनाका लड़का अपनी जॉब की वज़हसे बाहर गांव गया था लेकिन कई दिनोंसे उसकी कोई खबर नहीं आयी थी। इसको लेकर वह बहुत चिंतित रहती थी। अपने बेटे की खुशामदी के लिये वह हर रोज प्रार्थना करती थी। वह और एक काम करती थी,घर के सभी लोगों को खाना बनाते वक्त वह एक ज्यादा रोटी बनाती थी और उसे खिड़की के बाहर रखती थी। यह उसका रोज़का काम था। वह चाहती थी कि, कोई गरीब इसे खाकर उसे आशीर्वाद दे ताकि उसका लड़का हमेशा सही सलामत रहे।
               एक गरीब कुबड़ा हमेशा वहाँ खिड़कीपर रखी रोटी उठाता था। वह शिनासे कुछ बोलता नहीं था मगर अपने मुँह में कुछ बड़बड़ाते रहता। वह कहता था, " बुरा आपके पासही रहेगा। अच्छा आपके पास लौट आएगा।" हमेशा रोटी उठातें वक्त वह यहीं बात बोलता था,लेकिन उसका यह कहना शीनाके समझ से बाहर था।कई दिनोंतक यहीं चल रहा था।उसके एक भी शब्द नहीं बोलनेसे शीना को अच्छा नहीं लग रहा था। उसको लगता था,की वह कुबड़ा कितना घमंडी और कृतघ्न इंसान है वह हर रोज रोटी खाता था पर एक बार भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त नही करता था। उस कुबड़े के इस बर्तावसे वह ऊब गयी थीं। पहलेही वह अपने बच्चे के लिए परेशान थीं और फिर यह कुबड़ा उसकी परेशानी और बढ़ा रहा था।
            एक दिन शीना ने उस कुबड़े की रोटी में ज़हर मिलाने की बात सोची। रोटी बनाते समय उसने रोटी में ज़हर मिलाया और उसको खिड़की पर रखा। जैसे ही वह रोटी रख कर अंदर चली गयी उसका मन उसे खाने लगा। वह ख़ुदको बुरा महसूस करने लगीं। वह खिड़की के पास गयी वह जहरवाली रोटी उठायी और उसी जगह फिरसे एक अच्छी रोटी रखी। कुछी समय बाद वह गरीब कुबड़ा रोटी उठाने आया और रोटी ले जाते वक्त फिरसे बोला," बुरा आपके पासही रहेगा। अच्छा आपके पास लौट आएगा।" शीना को गुस्सा आ रहा था लेकिन अपने ग़ुस्से को क़ाबू कर वह अपने बेटे के बारे में सोंचने लगी।
       उस दिन वह बहुतही बैचैन हो गयी थीं। एक तो उसने कुबड़े को मारना चाहा था और दूसरी ओर उसके बेटे की कोई ख़बर नही थीं। वह सोच में डूबी हुई थी कि उसके दरवाज़े पर किसीने दस्तक दी। उसने दरवाजा खोला तो वह हक्काबक्का रह गईं।उसके सामने उसका बेटा खड़ा था। बिल्कुल थका हुआ, उसका शरीर तो जैसे लकड़ी तरह सूखा हुवा था। उसका चेहरा सिकुड़ गया था। उसमें शायद थोड़ीसी ही जान बची थीं। शीना ने उसे रोते हुए गले लगया। उसे अंदर ले आयी।उसे पानी पिलाया और उसके इस हालत के बारे में पूछताछ करने लगी। लड़का अपने बुरे दिनों के बारे में बोलने लगा। कैसे वह बिना कुछ खाये पिये यहां वहां घूमता रहा और किस तरह वह अपने शहर तक पहुंचा इसके बारेमें बताया।
             वह आगे बोलता गया," मैं हमारे घर से तकरीबन एक किलोमीटर पर भूक से बेहाल होकर मरने के कगार पर था, मेरा पूरा शरीर लड़खड़ा रहा था। मुझे जोरोसे चक्कर आ रही थीं तभी एक गरीब कुबड़े ने मेरे हात में एक रोटी रखी और मुझे खानेके लिये कहा। मैंने बिना कुछ सोचे वह रोटी खायी तभी मुझमे थोड़ी हिम्मत आ गयी। अगर वह कुबड़ा मुझे रोटी नहीं देता तो शायद मैं वही मर जाता।"
             उसकी बातें सुन शीना फूटफूटकर रोने लगीं। उसको पता चल चुका था कि वह वहीं कुबड़ा था जो हर रोज उसके खिडकीसे रोटी उठता था। वह सोंचने लगी अगर उसने जहरवाली रोटी नहीं बदली होती तो उसके साथ क्या होता। उसको कुबड़े की बात 'बुरा आपके पासही रहेगा। अच्छा आपके पास लौट आएगा।' इसका सही मतलब समझ मे आ गया था।
       कितनी सही बात है ना? हम कर्म करते वक्त सोचते भी नही के वही लौटकर हमारे पास आने वाला है। हम बिना सोचे ही लोगोके साथ बर्ताव करते रहते हैं। हमारे द्वारा किया हुवा हर एक व्यवहार आखिरकार हमारे पास ही खतम होने वाला है। हम वही काटते है जो हमने बोया होता हैं। अगर आपका समय अच्छा हैं तो इसका एकहि मतलब है कि अपने कुछ अच्छा किया है अगर आपका समय खराब है तो सोचना आपने कौनसी ग़लती की है। आपने क्या बुरा किया हैं। अगर जिंदगी में हमेशा अच्छा महसूस करना है तो आपको हमेशा अच्छा व्यवहार करना पड़ेगा।

'The bad you do ; remains with you. The good you do; returns to you.'

Let's always do the good.

Mr. Abhijeet Manav.

Beyond Habits: The Power of an Identity Shift

  Beyond Habits: The Power of an Identity Shift Most people approach change backward. They say, "If I go to the gym every day (Action),...