त्याग
भारतभूमि अनेक राजाओंकी पराक्रम और महानता की साक्षी रही हैं। भारतवर्ष को इतना वैशिष्ट्यपूर्ण और विश्वमें पराक्रमी बनानेमें यहाँ के कई राजाओका महत्व पूर्ण योगदान रहा है। उनमेंसे एक थे मौर्य साम्राज्य को पूरे भारतवर्ष में फैलाने वाले राजा चंद्रगुप्त मौर्य। वेह बड़ेही साहसी,पराक्रमी और न्यायप्रिय थे। चंद्रगुप्त ने अपने गुरु चाणक्य के साथ, एक नया साम्राज्य बनाया, राज्यचक्र के सिद्धांतों को लागू किया, एक बड़ी सेना का निर्माण किया और अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।
यह बात तब की है, जब राजा चंद्रगुप्त मौर्य,राजा धनानन्द की बेटी दुर्धरा से प्यार करते थे। चंद्रगुप्त राजकुमारी दुर्धरा से बहुत प्यार करते थे। बहुत लगाव रखते थे। लेकिन जब यह बात गुरु चाणक्य के पास पहुँची तो उन्होंने राजा चंद्रगुप्त मौर्य को दुर्धरा से दूर रहनेकी सलाह दी। चंद्रगुप्त राजकुमारी से दूर रहने लगें लेकिन उन्हें इस दुरी से बहुत दुःख होता था।तभी एक दिन चंद्रगुप्त चाणक्य से बोले," आचार्य,इस मौर्य साम्राज्य की नींव रखने के लिए और भारतवर्ष में अखंड साम्राज्य का विस्तार करने के लिये मुझे अपनी प्राणोंसे प्रिय दुर्धरा से दूर रहना पड़ रहा हैं। मेरे जीवन मे उससे दूर रहने से ज्यादा और कोई कठिन काम नही हो सकता। भारतवर्ष के निर्माण प्रति और सम्राट बनने के लिए मुझे अगर यह त्याग और बलिदान नहीं करना पड़ता तो?"
चाणक्य बोले," तो फिर भारतवर्ष के हर एक घरमें सम्राट पैदा होता।"
गुरु चाणक्य का यह जवाब किसीभी बड़े कार्य के पीछे का बड़ा त्याग दर्शाता हैं।अगर कोई भी चीज बिना किसी त्याग, समर्पण और कड़ी मेहनत के सिवा हासिल होती तो वह कोई भी पा सकता है। हर कोई जिंदगी में सफ़ल बनना चाहता है।जिन्दगीका हर एक सपना पूरा करना चाहता है। हर कोई ऊंची उड़ान भरना चाहता हैं।हर कोई अपनी पहचान बनाना चाहता हैं। जिन्दगीके हर एक सुख को अपनाना चाहता है लेकिन यह सब उसीको सम्भव होता हैं जो यह सब हासिल करने के लिये जिन्दगीके कुछ प्राणप्रिय सुखोंको त्यागता हैं। अपने सपनों को हकीकत में लाने के लिये त्याग करने के लिये तैयार होता हैं।
कभी कभी हम ऐसी क्रियायें करना छोड़ देते है, जो हमे करनी ही नही चाहिए और हम यह सोंचते हैं कि हमने त्याग किया है।जैसे अगर हमने कभी दूरदर्शन देखना बंद किया तो हम सोचते हैं की हमने त्याग किया है। जब हम लोगोंके बारे में भलाबुरा बोलना छोड़ देते हैं,अनापशनाप बोलना छोड़ देते हैं या फिर बेमतलब के गप्पें करना छोड़ देते है तो हमे लगता है की हमने त्याग किया हैं।सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल,बेवज़ह यहां वहां घुमने पर पाबंदी और ऐसी कई सारी क्रियाओंसे खुद को दूर करने का मतलब त्याग नहीं होता।अगर एखाद विद्यार्थी परीक्षा के दौरान दूरदर्शन पर चल रही मनचाही फ़िल्म छोड़कर अपनी पढ़ाई करेगा तो क्या वह त्याग कहलायेगा ? नही बिल्कुल नहीं।
इसीलिए हम सभीको त्याग का सही मतलब मालूम होना जरुरी हैं। त्याग का मतलब होता है कि ख़ुदको ऐसी बातों से दूर रखना जो बातें हमारे जीवन मे मुल्य पैदा करती है।जो बातें हमारे जीवन का अहम हिस्सा होती है।कभी कभी उनका त्याग करनेसे कई सारी खुशियों से ख़ुदको वंचित होना पड़ता है। उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है।लेकिन खुदकी और आनेवाली कई पीढ़ियों की उन्नति और सुखों को ध्यान मे रखकर अपनी ही खुशियों का हमे गला घोंटकर जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता हैं। वास्तविक रूप में यह बात मनचाही नहीं होती लेकिन उस वक्त अपने खुद के चाहत से ज्यादा लक्ष्य को हासिल करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है। त्याग वह है जो भगवान महावीर और भगवान गौतम बुद्ध ने अंतिम ज्ञान पाने हेतू अपना राजमहल छोड़कर किया था। त्याग वह है जो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरजी ने किया था। भारतीय समाजमें समानता लाने हेतु अपने निजी स्वार्थ को छोड़,अपने परिवार और बच्चों की परवाह किए बिना,अपने स्वास्थ्य की चिंता किये बिना दिनरात काम करते रहे और अपने लक्ष्य को पाया।यह त्याग हैं।
जीवन मे कुछ पाने हेतु आवश्यक बातों को त्यागना किसीके भी बस की बात नही हैं। उसके लिये अपने लक्ष्य के प्रति जीवन से ज्यादा लगाव होना चाहिए।आप खुदकी जिंदगी बनाने के लिये और आनेवाली कई पीढ़ियों को ऊर्जा देने के लिये क्या क्या त्यागना चाहेंगें?
Let's sacrifies something today for better tomorrow.
Mr.Abhijeet Manav.
भारतभूमि अनेक राजाओंकी पराक्रम और महानता की साक्षी रही हैं। भारतवर्ष को इतना वैशिष्ट्यपूर्ण और विश्वमें पराक्रमी बनानेमें यहाँ के कई राजाओका महत्व पूर्ण योगदान रहा है। उनमेंसे एक थे मौर्य साम्राज्य को पूरे भारतवर्ष में फैलाने वाले राजा चंद्रगुप्त मौर्य। वेह बड़ेही साहसी,पराक्रमी और न्यायप्रिय थे। चंद्रगुप्त ने अपने गुरु चाणक्य के साथ, एक नया साम्राज्य बनाया, राज्यचक्र के सिद्धांतों को लागू किया, एक बड़ी सेना का निर्माण किया और अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।
यह बात तब की है, जब राजा चंद्रगुप्त मौर्य,राजा धनानन्द की बेटी दुर्धरा से प्यार करते थे। चंद्रगुप्त राजकुमारी दुर्धरा से बहुत प्यार करते थे। बहुत लगाव रखते थे। लेकिन जब यह बात गुरु चाणक्य के पास पहुँची तो उन्होंने राजा चंद्रगुप्त मौर्य को दुर्धरा से दूर रहनेकी सलाह दी। चंद्रगुप्त राजकुमारी से दूर रहने लगें लेकिन उन्हें इस दुरी से बहुत दुःख होता था।तभी एक दिन चंद्रगुप्त चाणक्य से बोले," आचार्य,इस मौर्य साम्राज्य की नींव रखने के लिए और भारतवर्ष में अखंड साम्राज्य का विस्तार करने के लिये मुझे अपनी प्राणोंसे प्रिय दुर्धरा से दूर रहना पड़ रहा हैं। मेरे जीवन मे उससे दूर रहने से ज्यादा और कोई कठिन काम नही हो सकता। भारतवर्ष के निर्माण प्रति और सम्राट बनने के लिए मुझे अगर यह त्याग और बलिदान नहीं करना पड़ता तो?"
चाणक्य बोले," तो फिर भारतवर्ष के हर एक घरमें सम्राट पैदा होता।"
गुरु चाणक्य का यह जवाब किसीभी बड़े कार्य के पीछे का बड़ा त्याग दर्शाता हैं।अगर कोई भी चीज बिना किसी त्याग, समर्पण और कड़ी मेहनत के सिवा हासिल होती तो वह कोई भी पा सकता है। हर कोई जिंदगी में सफ़ल बनना चाहता है।जिन्दगीका हर एक सपना पूरा करना चाहता है। हर कोई ऊंची उड़ान भरना चाहता हैं।हर कोई अपनी पहचान बनाना चाहता हैं। जिन्दगीके हर एक सुख को अपनाना चाहता है लेकिन यह सब उसीको सम्भव होता हैं जो यह सब हासिल करने के लिये जिन्दगीके कुछ प्राणप्रिय सुखोंको त्यागता हैं। अपने सपनों को हकीकत में लाने के लिये त्याग करने के लिये तैयार होता हैं।
कभी कभी हम ऐसी क्रियायें करना छोड़ देते है, जो हमे करनी ही नही चाहिए और हम यह सोंचते हैं कि हमने त्याग किया है।जैसे अगर हमने कभी दूरदर्शन देखना बंद किया तो हम सोचते हैं की हमने त्याग किया है। जब हम लोगोंके बारे में भलाबुरा बोलना छोड़ देते हैं,अनापशनाप बोलना छोड़ देते हैं या फिर बेमतलब के गप्पें करना छोड़ देते है तो हमे लगता है की हमने त्याग किया हैं।सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल,बेवज़ह यहां वहां घुमने पर पाबंदी और ऐसी कई सारी क्रियाओंसे खुद को दूर करने का मतलब त्याग नहीं होता।अगर एखाद विद्यार्थी परीक्षा के दौरान दूरदर्शन पर चल रही मनचाही फ़िल्म छोड़कर अपनी पढ़ाई करेगा तो क्या वह त्याग कहलायेगा ? नही बिल्कुल नहीं।
इसीलिए हम सभीको त्याग का सही मतलब मालूम होना जरुरी हैं। त्याग का मतलब होता है कि ख़ुदको ऐसी बातों से दूर रखना जो बातें हमारे जीवन मे मुल्य पैदा करती है।जो बातें हमारे जीवन का अहम हिस्सा होती है।कभी कभी उनका त्याग करनेसे कई सारी खुशियों से ख़ुदको वंचित होना पड़ता है। उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है।लेकिन खुदकी और आनेवाली कई पीढ़ियों की उन्नति और सुखों को ध्यान मे रखकर अपनी ही खुशियों का हमे गला घोंटकर जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता हैं। वास्तविक रूप में यह बात मनचाही नहीं होती लेकिन उस वक्त अपने खुद के चाहत से ज्यादा लक्ष्य को हासिल करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है। त्याग वह है जो भगवान महावीर और भगवान गौतम बुद्ध ने अंतिम ज्ञान पाने हेतू अपना राजमहल छोड़कर किया था। त्याग वह है जो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरजी ने किया था। भारतीय समाजमें समानता लाने हेतु अपने निजी स्वार्थ को छोड़,अपने परिवार और बच्चों की परवाह किए बिना,अपने स्वास्थ्य की चिंता किये बिना दिनरात काम करते रहे और अपने लक्ष्य को पाया।यह त्याग हैं।
जीवन मे कुछ पाने हेतु आवश्यक बातों को त्यागना किसीके भी बस की बात नही हैं। उसके लिये अपने लक्ष्य के प्रति जीवन से ज्यादा लगाव होना चाहिए।आप खुदकी जिंदगी बनाने के लिये और आनेवाली कई पीढ़ियों को ऊर्जा देने के लिये क्या क्या त्यागना चाहेंगें?
Let's sacrifies something today for better tomorrow.
Mr.Abhijeet Manav.